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Tuesday, January 30, 2018

उत्तराखंड के मनीष बने जूनियर कराटे चैंपियन

उत्तराखंड के एक नौनिहाल ने कराटे की जूनियर वर्ग की प्रतियोगिता में सोने का तमगा जीतकर इस बात पर फिर से मोहर लगा दी है कि इस पर्वतीय राज्य में प्रतिभा की कमी नहीं है। उत्तराखंड की टीम भले ही 12 वें स्थान पर रही हो, मगर मनीष बिष्ट ने स्वर्ण पदक जीतकर हमारा सीना गर्व से चौड़ा कर दिया। उत्तराखंड की टीम ने  कुल 11 पदक जीते, जिनमें एक स्वर्ण, दो रजत और 8 कांस्य पदक शामिल हैं।

इस प्रतियोगिता का आयोजन पतंजलि योगपीठ के श्रद्धालयम सभागार में किया गया। ऑल इंडिया कराटे-डू फेडरेशन की ओर से आयोजित इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप के समापन समारोह में पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद लोगों को संबोधित किया। उन्होंने युवा पीढ़ी को योग का महत्व समझाया और कहा कि ध्यान करने से एकाग्रता बढ़ती है।

29वीं राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप में 61 पदक जीतकर मध्यप्रदेश ने पहला स्थान कब्ज़ाया, तो 39 पदक जीतकर राजस्थान दूसरे स्थान पर रही, जबकि18 पद जीतकर महाराष्ट्र ने चौथा स्थान हासिल किया।

Monday, April 25, 2016

उत्तराखंड में अराजकता जैसे हालात के लिए - कांग्रेस और भाजपा दोनों जिम्मेदार

पंद्रह साल से जिस डगर पर उत्तराखंड की राजनीति चल रही है,उसका इससे बुरा हश्र और क्या सकता है कि उस राज्य की अब दिल्ली दरबार में कोई पूछ तक नहीं होती वह अब सुर्खियों में आया भी तो बदनुमा दागों ने राज्य की जनता को शर्मसार कर डाला। दो साल पहले लोकसभा चुनावों में पांचों सीटें भाजपा की झोली में डालने के बावजूद पहाड़ के लोग अच्छे दिनों के लिए तरस रहे हैं। केंद्र में कोई मंत्री तक नहीं बनाया गया।
उत्तराखंड के लोगों के लिए अब सुकुन मनाने को महज यही जुमला बचा है कि - नाम बड़े और दर्शन छोटेे! हाल में इस छोटे प्रदेेश में पिछलेे माह कांग्रेस विधायक दल दो फाड़ हुआ तो जून 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद हाल के हैरतअंगेज संवैधानिक संकट ने यहां की सरल दिखने वाली राजनीति के मिजाज में भूचाल पैदा कर डाला। 70 सदस्यीय विधानसभा वाले इस प्रदेश में सरकार गिरानेेे-बचाने के लिए एक- एक विधायक की बोली करोड़ों में लगी तो सत्ता और धनबल की मायावी जाल से  आम लोग भौंचक्क हैं।

राज्य सरकार की बर्खास्तगी का मामला अब विकट कानूनी दांवपेच में उलझ चुका है। कई- कई मुकदमों की झड़ी लग चुकी है। नैनीताल की उत्तराखंड हाईकोर्ट में बहस अब इस बात पर हो रही है कि पहले मुर्गी पैदा हुई या अंडा। 18 मार्च को विधानसभा में कथित तौर पर अल्पमत में आयी हरीश रावत सरकार के विनियोग विधेेयक को केंद्र ने अवैध ठहराते हुए नया आध्यादेश जारी कर दिया तो वहां के स्पीकर का दावा है कि उन्होने इस विधेयक को पारित मान लिया था और लगे हाथ कांग्रेस के बागी नौ विधायकों की सदस्यता खत्म कर डाली। केंद्र ने मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा विधायकों की सौदेबाजी के स्ंिटग के आधार पर राज्य में 356 लगा दिया तो बर्खास्त विधायक भी स्टेे के लिए हाईकोर्ट धमक आए।

त्रायदी यह है कि अलग राज्य बनने 16 साल बाद भी यहां नेताओं व असफरों की मौज के अलावा सब कुछ पटरी से उतरा हुआ है। यहां लोगों ने बारी- बारी से भाजपा- कांग्रेस का शासन चलाने की बंदरबांट करीब से देख ली। इन तमाम बरसों में ये दोनों पार्टियां प्रदेश की स्थायी राजधानी तक नहीं बना पाईं तोे लोगों नेे उनसे विकास की उम्मीदें कैसे करें।ं जिस मकसद के लिए इस राज्य की नींव पड़ी, वे सारे सपने दोेनों दलों ने मिलजुलकर सत्ता में के नशे में दफन कर दिए गए। मुख्यमंत्री हरीश रावत को जब कुछेक ज्योतिषियों नेे पठा दिया कि अगले चुनाव के बाद वे ही दोेबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले हैं तो तब से वे फूले नहीं समा रहेे थे। उसके पहले अंधेर नगरी चैपट राजा की तर्ज पर उनके दरबारियों नेे कुछ दिनों पहले रेसलिंग का खूनी खेेल पर राज्य का पैसा लुटाकर पूरे देश में इस पहाड़ी राज्य का माखौल उड़वा दिया।

त्रासदी यह है कि सियासत में बैठे लोग पर्वतीय लोगों के हितों के प्रति आंख बंद कर बैठे हैं। यहां से बडे पैमाने पर सुदूर गांवों से पलायन  अलग राज्य बनने के बाद तेज होता गया। करीब 3000 गांव खाली होकर वीरान खंडहरों में तब्दील होे चुके लेकिन मुख्यमंत्री और उनके नौकरशाहों की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं क्योंकि इन उजड़ते गांवों को आबाद करने में शायद ही किसी जमीन, रेत- बजरी या शराब माफिया की कोई दिलचस्पी होगी। इसके उलट मुख्यमंत्री रावत को देहरादून को स्मार्ट सिटी बनाने की चिंता दिन - रात सताए जा रही थी। त्रासदी यह है कि उत्तराखंड में सत्ता में आतेे ही कांग्रेस व भाजपा दोनों एक नाव में सवार हो जाते हैं। सत्ता से पैसा और पैसे से सत्ता का मूल मंत्र एक है। दोनों दलों में कौन मुख्यमंत्री होगा और कौन कब हटेगा यह सब दिल्ली तय करती है।सोे आम पर्वतीय लोगों के लिए अलग राज्य अभिषाप बन चुका है।

एक बात पहाड़ के उत्तराखंडवासियों को बखूबी पता लग चुकी कि 18 मार्च 2016 को उत्तराखंड की विधानसभा में सरकार गिराने को जो भी नाटक हुआ, उसका पहाड़ी जनता के आंसू पोंछनेे या उनकी दुख तकलीफों से कुछ भी लेना देना नहीं है। एक दूसरे को सबक सिखाने, बदला लेने, हिसाब चुकता करने, कुर्सी हथियाने, पद पैसा और संपत्तियां बनाने तक सारी लड़ाई सिमटी हुई है। ये सब भूल गए कि इस राज्य का निर्माण पहाड़ों की भोली-भाली जनता के कड़ेे संघर्ष से हुआ। सुदूर गांव- देहातों में जिन्होंने कभी किसी आंदोलन को देखा तक न था वे 20- 22 बरस पूर्व अलग राज्य आंदोलन में कूदे। खटीमा, मसूरी और मुजफ्फरनगर गोली कांड हुआ। उत्तराखंड आंदोलन के दौरान  कुल 46 लोगों नेे अपनी जानें कुर्बान कीं।
इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि 9 नवंबर सन् 2000 को भाजपा की पहली अंतरिम सरकार बनने के साथ ही इस नवोदित राज्य के बुरे दिन शुरू हुए। केंद्र में भाजपा सरकार थी। उसने बिना कुछ सोचे समझे देहरादून को अस्थायी राजधानी बनाने का सबसे बड़ा आत्मघाती फैसला किया और नित्यानंद स्वामी को अंतरिम सरकार का मुख्यमंत्री बना दिया। यहीं से इस पर्वतीय राज्य की राजधानी देहरादून, सत्ता के दलालों, जमीनों की खरीद-फरोख्त में जुटे प्राॅपर्टी डीलरों, ठेकेदारों, शराब, रेत, बजरी, जंगलों से अवैध लकड़ी और कई तरह की तस्करी का खेल शुरू हुआ। माफिया को और सुगमता  इसलिए हुई कि हरिद्वार की नगरपालिका के बाहर पूरा हरिद्वार जिला जो पश्चिमी यूपी से तीन ओर घिरा है, उसे उत्तराखंड में शामिल करा दिया गया। दूसरा उधमसिंह नगर जिला है जहां देहरादून की तरह बड़े पैमाने पर मैदानी क्षेत्रों के लोगों ने लचर कानूनों को ठेंगा दिखाकर राज्य बनने के बाद बेहिसाब जमीन व संपत्तियां खरीद लीं। राज्य निर्माण के बाद सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानीय परंपरागत कृषि व्यवस्था मजबूत करने व गांवों को स्वावलंबी बनाने की बातें पार्टियों के एजेंडे से बाहर हो गई। एक नई पहल 2007 में जरूर हुई जब भाजपा सरकार ने  108 नंबर की आपात मेडिकल एंबुलेंस की शुरुआत की। लेकिन बेसिक शिक्षा की गुणवत्ता, घर बैठकर सरकार से मोटा वेतन लेने वाले कामचोर शिक्षकों व सफेद हाथी बन चुके शिक्षा विभाग को रास्ते पर लाने की सारी कसरतें बेकार साबित हुईं।  उद्योगांें से पिछडे़ उत्तराखंड में विशेष राज्य की टैक्स छूट लूटने नाम पर नया गोरखधंधा अलग से चालू हुआ। इसमें उद्योगों को लुभाने के नाम पर उन्हें कौडि़यों के भाव फैक्ट्रियां और औद्योगिक भूमि के मालिक  बनाने का गोरखधंधा कई घोटालों का रूप ले चुका है। टैक्स चोरी के लिए इन उद्योगों में उत्पादन केवल कागजों में दिखाया जाता है। विशेष राज्य के दर्जे के तहत इक्साइज व सेल टैक्स छूट का लाभ उठाकर उत्तराखंड के राजकोष को खुलेआम लूटा जा रहा है।

शराब कारोबार की डोर सत्ता में बैठे ताकतवर लोगों के हाथ में राज्य बनने के पहले से थी लेकिन उसके बाद तो शराब के कारोबार में शामिल व उन्हें सरंक्षण देने वाले लोग पहले भाजपा व बाद में कांग्रेस दोनों सरकारों में मंत्री व दूसरे अहम पदों पर सुशोभित रहे। सरकारें बनाने व गिराने का पूरा काम शराब माफिया के हाथ में 2002 में नारायण दत्त तिवारी व उसके पहले भाजपा की अंतरिम सरकार में ही चालू हो चुका था।   नारायणदत्त तिवारी बनाम हरीश रावत की टकराहट शुरू हुई तो उत्तराखंड, यूपी और पंजाब में शराब कारोबारियों व गुर्गांेे का पूरा काफिला उत्तराखंड भवन से लेकर उत्तरप्रदेश भवन तक डेरा डाले देखा जाता था। 2002 के बाद कांग्रेस की पांच साल तक सरकार रही। शराब माफिया की एक ही मांग होती है कि राज्य की शराब नीति हम तैयार केरंगे। शराब की बिक्री उत्तराखंड के गांव-गांव में होती है, सो शराब के सारे कारोबारी राज्य बनने के बाद उत्तराखंड में अकूत संपत्तियांें के मालिक बनते रहे। 2007 में कांग्रेस की तिवारी सरकार के हटनेे के बाद भाजपा की सरकार बनी तो भाजपा सरकार ने शराब नीति को पारदर्शी बनाने की कोशिश हुई तो इससे शराब माफिया ने विरोध करना शुरू किया। शराब माफिया ने उस दौर में भाजपा आलाकमान में भी पैठ बनाई और दिल्ली में भाजपा आलाकमान तक अपनी गोटियां फिट करके जनरल बीसी खंडूडी की तत्कालीन सरकार को पूरे दो साल तक अस्थिर करने का खुला खेल किया। जीत शराब माफिया की हुई, क्योंकि तब मुख्यमंत्री की कार्यशैली से नाराज विधायकों की दिल्ली दौड़ और उनके मोटे खर्चों का इंतजाम शराब माफिया के लोग करते थे।

फरवरी 2014 में हरीश रावत के सीएम बनने के बाद पहाड़ के लोगों के मन में कई तरह की आस- उम्मीदें जगीं थीं। लेकिन जमीन माफिया, बिल्डर, भ्रष्ट और बदनाम नौकरशाहों को संरक्षण देने की उनकी प्रवृत्ति ही उनके लिए आत्मघाती साबित हुई। कुछ बदनाम लोगों सेे घिरे होने, पार्टी में सबको साथ लेकर न चलाना और सत्ता के गरूर में वे अपने ही लोगों से दूर होते गए। बिल्डर व जमीनों के कारोबार करने वालों के टीवी चैनलों की बाढ और नेताओं, मंत्रियों और अफसरों से उनकी सांठगांठ और ब्लैकमेल की दोहरी चालबाजियों से पूरे पहाड़ में त्राहि-त्राहि मची है। माफिया और ब्लैकमेलर मीडिया की पहुंच जब सीधे सत्ता व विपक्ष के शीर्ष पर बैठे लोगों के बेडरूम तक हो फिर ऐसी तरह कठपुतली सरकारें रहें या जाएं, जनता क्यों परवाह करेगी।
---  उमाकांत लखेड़ा
(उमाकांत लखेड़ा जी हिंदी के बड़े पत्रकार हैं और दैनिक जागरण व हिंदुस्तान जैसे अखबारों में महत्वपूर्ण पदों की शोभा बढ़ा चुके हैं।)

Friday, April 1, 2016

कांग्रेस और भाजपा,दोनों ने उत्तराखंडियों को बनाया अप्रैल फूल

कांग्रेस और भाजपा,दोनों ने  हमेशा उत्तराखंडियों को बनाया अप्रैल फूल बनाया है। हम इन राष्ट्रीय दलों को अपनी ज़मीन में इस उम्मीद में जिताते चले आये हैं क़ि वो हमें बराबरी का इंसान समझेंगे और हमारा विकास करेंगे, मगर नेता लोग हमें बेवकूफ समझते हैं। हमारे वोटों से चुनाव जीतकर हर बार हमें अप्रैल फूल बना देते हैं।

हैरानी तो इस बात की होती है कि फण्ड न होने का रोना रोकर जो नेता विकास कार्यों की उपेक्षा करते हैं, उनके पास दलबदल कराने के लिए करोड़ों रूपए कहाँ से आ जाते हैं।

उत्तराखंड के लोग देश के अन्य राज्यों में भी रहते हैं और वहां भी उनकी घोर उपेक्षा  की जाती है। दिल्ली में तो करीब 35 लाख उत्तराखंडियों के रहने का दावा किया जाता रहा है और एक भी विधायक उत्तराखंड मूल का नहीं है। क्या ये राजनीतिक दल डेमोक्रेसी का भी मजाक नहीं उड़ा रहे हैं? केजरीवाल जी दिल्ली में आपकी पार्टी के कितने विधायक हैं?

अब उत्तराखंड में जो राजनीतिक सर्कस चल रहा है, क्या आप सोचते हैं कि उससे हम उत्तराखंडियों को फायदा होगा? अगर आप ऐसा सोचते हैं तो मेरे भोले भले भाई बहनों जाग जाओ। ये आपको एक बार फिर से अप्रैल फूल बनाने की तैयारी है।

Monday, March 28, 2016

हरीश रावत की ये 5 गलतियां भी बनीं उत्तराखंड के राजनीतिक संकट की वजह

उत्तराखंड आज गंभीर राजनीतिक संकट में फंसा है, तो हरीश रावत से ज़्यादा इसके लिए कोई और दोषी नहीं है। आप कहेंगे कि हरीश रावत तो खुद षड्यंत्रकारियों की चालबाज़ी का शिकार हुए हैं। आपकी बात ग़लत नहीं है, लेकिन याद रखिए कि सतपाल महाराज और बहुगुणा ने कांग्रेस खुशी-खुशी या आऱसएस की विचारधारा में अचानक उमड़ आई श्रृद्धा की वजह से नहीं छोड़ी थी। क्या हरीश रावत नहीं जानते थे कि ये दिग्गज नेता उनके खिलाफ ऐसे ही किसी सत्ता-पलटू साजिश में व्यस्त होंगे? 

अगर हम कहें कि हरीश रावत आज उत्तराखंड के सबसे बड़े राजनीतिज्ञ हैं, तो उनके करीब 4 दशक लंबे राजनीतिक जीवन को देखते हुए यह ग़लत नहीं होगा। कई बड़े पदों पर वह रहे और कई चुनाव उन्होंने जीते, सबसे बड़ी बात कि उत्तराखंड के निर्माण के बाद जब भी कांग्रेस ने राज्य में सत्ता का स्वाद चखा, उसमें हरीश रावत का योगदान सबसे ज़्यादा था। फिर भी आज अगर उत्तराखंड राजनीतिक संकट में फंसा है, तो इसके लिए हरीश रावत के ये 5 फैसले जिम्मेदार हैं: 

  1. कई खेमों में बंटी उत्तराखंड कांग्रेस को एकजुट करने की कोशिश नहीं करना - सतपाल महाराज के भाजपा में जाने के बाद से ही बगावत की शुरुआत हो गई थी, हरीश रावत ने कांग्रेस को एकजुट करने की कोशिश नहीं की।
  1. खुद अपना गुट बनाकर उसे पालना-पोसना - मुख्यमंत्री बनने के बाद हरीश रावत को उत्तराखंड में दरबारी कल्चर खत्म करना चाहिए था और कांग्रेस में गुटबाजी खत्म करनी चाहिए थी, लेकिन वह खुद ही गुटबाजी के खेल में शामिल हो गए। उन्होंने हमेशा ये कोशिश की कि उनका गुट सबसे मज़बूत हो जाए। विरोधी गुटों को साथ रखने के लिए पद और लाभ बांटने पड़ते हैं, शायद रावत गुट इस बलिदान के लिए तैयार नहीं था। 
  1. दाग़ी अफसरों की तैनाती - हरीश रावत की सरकार में कई ऐसे अफसरों को भी महत्वपूर्ण विभागों में तैनात किया गया, जिनके अपने दामन पर दाग़ थे। विरोधी इसमें राजनीतिक अवसर देख रहे थे, लेकिन जनता को तो रोज़-रोज़ इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा था। यही वजह है कि उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लगने का आम उत्तराखंडी जनता ज़रा-सा भी विरोध नहीं कर रही है। 
  1. नाराज़ विधायकों को न मनाना - उत्तराखंड में कांग्रेस के पास विशाल बहुमत नहीं था, तो ऐसे में अपने नाराज़ विधायकों न मनाना खुद बगावत की आग को सुलगाने जैसा था। उत्तराखंड में यही हुआ। सतपाल महाराज से तो हरीश रावत की राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता थी ही, जब बहुगुणा मुख्यमंत्री पद से हटे, तो हरीश रावत ने उन्हें भी कोई महत्व नहीं दिया। तो दुश्मन का दुश्मन दोस्त साबित हुआ, तो बहुगुणा ने सतपाल से हाथ मिला लिया। इसके अलावा रायपुर (देहरादून) के विधायक ने एक अफसर की शिकायत मुख्यमंत्री से की, तो हरीश रावत ने कोई ध्यान नहीं दिया। परेशान विधायक ने अपना इस्तीफा लिखकर भी दिया, तो भी हरीश रावत सरकार ने दाग़ी अधिकारी के खिलाफ कोई एक्शन नहीं लिया। 
  1. अपनी सरकार के खिलाफ बगावत की तैयारियों को भांपने में फेल रहे हरीश रावत - हरीश रावत को उत्तराखंड की राजनीति का चाणक्य कहा जाता रहा है। उन्होंने हरिद्वार सीट से चुनाव कुमाऊं के भेदभाव को बहुत सीमा तक खत्म किया है, मगर अपनी सरकार के खिलाफ चल रही बगावत की तैयारियों को भांपने में वह बुरी तरह से फेल साबित हुए और इसकी कीमत उन्हें उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन के रूप में भुगतनी पड़ रही है। 

इतना सबकुछ होने के बावजूद यह भी सच है कि हरीश रावत इतनी आसानी से हार मानने वालों में से नहीं हैं। उन्होंने उत्तराखंड में राष्ट्रपति शासन लागू करने के फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। अगले हफ्ते तक साफ हो जाएगा कि कोर्ट में हरीश रावत को जीत मिलती है या नहीं।

Wednesday, March 23, 2016

शहीद सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरू को शत-शत नमन

अंग्रेजों के दमनकारी शासन ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के चमकते सितारों सुखदेव, भगत सिंह और राजगुरू को 23 मार्च के ही दिन लाहौर जेल में फांसी दे दी थी। ये तीनों शहीद भारतीयों के दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।
इन तीनों शहीदों को शत-शत नमन।

Monday, March 14, 2016

उत्तराखंड के नववर्ष की बहुत-बहुत बधाई

अज चैत्र महीने की एक गति है। अज के दिन को उत्तराखंड में नए साल के रूप में मनाया जाता है। आइये हम सब एक  दूसरे को उत्तराखंडी नव वर्ष की शुभकामना दें।

Tuesday, June 23, 2015

कोडिया-बनास-किमसार मोटर मार्ग के मामले पर जनता को बरगलाना अब संभव नहीं

Uttarakhand News - (सच्चिदानंद शर्मा) जनपद पौड़ी गढ़वाल के विधानसभा क्षेत्र यमकेश्वर में कोडिया -किमसार मोटर मार्ग, जो कि राजा जी राष्ट्रीय पार्क की सीमा में होने के कारण विगत लंबे समय से डामरीकरण की स्वीकृति के लिए लंबित पड़ा है, की सच्चाई जानने के लिए जब मैं 16 जून 2015 को गंगा भोगपुर उक्त मांग की स्वीकृति हेतू धरना स्थल पर बैठे क्षेत्रीय ग्रामीणों व जनप्रतिनिधियों के मध्य पहुंचा, तो वहाँ मामले को लेकर बहुत भ्रम की स्थिति थी । मामले की तह तक पहुंचने के बाद जो सच्चाई सामने आई वह चौकाने वाली है, जिसे सार्वजनिक करना मैं अपना दायित्व समझता हूँ, साथ ही सरकार के जो विभाग इस मार्ग में डामरीकरण में रोड़ा अटकाने की कोशिश कर रहे हैं, वो भी किसी गलतफहमी का शिकार न हों, उन्हें भी वस्तुस्थिति से रू-ब-रू होना ज़रूरी है, अन्यथा पीड़ित जनता यदि न्यायालय की शरण में चली गई, तो उन्हें लेने के देने पड़ संकते हैं।
(Sachidanand Sharma: Ex-state minister in the former BJP Government)
 एक तथ्य जो सामने आया है वह यह है कि कोडिया-बनास-किमसार मार्ग जो कि कोडिया से पहाड़ के रास्ते बनास होते हुए किमसार जाने का मार्ग है, जो सन 1978 में ही लोक निर्माण विभाग को हस्तांतरित होने के पश्चात लोक निर्माण विभाग द्वारा इसका पक्का निर्माण किया गया है । चूंकि इस मार्ग का हस्तांतरण वन (संरक्षण ) अधिनियम 1980 से पूर्व किया गया था, अतः इसके लिए भारत सरकार की पूर्वानुमति की कोई आवश्यकता नहीं थीं। यधपि हस्तांतरित क्षेत्र विधिक रूप से आरक्षित वन व राजाजी राष्ट्रीय पार्क के अंतर्गत स्थित है, तथापि उक्त मार्ग का रखरखाव व प्रबंधन लोक निर्माण विभाग के पास ही रहेगा, इसका पुनः डामरीकरण व मरम्मत आदि कार्य संपन्न करने में कोई विधिक अड़चन नहीं है।

दूसरा तथ्य जो सामने आया वह यह कि कच्चे मार्ग को पक्का कर डामरीकरण पर रोक केवल कोडिया -विन्ध्वासिनी -किमसार वन मोटर मार्ग पर लागू है, जो नदी के किनारे विन्ध्वासिनी होते हुए किमसार तक जाने वाला मोटर मार्ग है। माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा गठित सी ० ई ० सी द्वारा कोडिया -विन्ध्वासिनी -किमसार वन मोटर मार्ग के सुदृढ़ीकरण पर रोक लगाई गई थी, ना कि कोडिया -बनास -किमसार मोटर मार्ग पर।
(Sachidanand Sharma speaking before local public)
वर्तमान में प्रदेश सरकार दो पृथक मार्गो के एक जैसे नाम होने के कारण जन आंदोलन को भ्रमित कर रही है। जिस कोडिया-बनास -किमसार मोटर मार्ग के डामरीकरण के लिए जनता आन्दोलनरत है उसके निर्माण में किसी भी प्रकार की वैधानिक अड़चन नहीं है। माननीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भारत सरकार द्वारा उपरोक्त विषयक बयान से अब प्रदेश सरकार की नींद खुल गयी होगी कि रिजर्व फॉरेस्ट व पार्क क्षेत्रों में स्थित वन अधिनियम 1980 से पूर्व के मार्गों पर भारत सरकार का उनके सुदृढ़ीकरण , डामरीकरण , रख रखाव अथवा विकास कार्यों हेतू किसी प्रकार का प्रतिबन्ध ना तो पूर्व में था ना ही वर्तमान में हैं बशर्ते सडकों का विस्तार व चौड़ीकरण आदि कार्यों से पूर्व समस्त औपचारिकता पूर्ण किया जाना आवश्यक होगा।
(Sachidanand Sharma speaking to the press)
अब यदि प्रदेश सरकार केंद्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय का बहाना लेकर कोडिया- बनास -किमसार मोटर मार्ग का डामरीकरण, बिंज नदी पर सेतु व बाढ़ नियंत्रण हेतु तल्ला गंगा भोगपुर में तट बन्धो के निर्माण कार्यो में विलम्ब करती है, तो इसके लिए क्षेत्रीय जनता प्रदेश सरकार को कभी माफ़ नहीं कर सकती। प्रदेश सरकार को सम्बंधित विकास कार्यो में अविलम्ब अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, इन मुद्दों पर जनता को और अधिक समय तक बरगलाया नही जा सकता।

(सच्चिदानंद शर्मा उत्तराखंड की पूर्व भाजपा सरकार में राज्यमंत्री थे।)