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Friday, December 26, 2014

नई दिल्ली विधानसभा क्षेत्र में एक उत्तराखंडी की सिंह-गर्जना

Uttarakhand News, New Delhi - अभी बीते रविवार की बात है। उसी दिन लिखे मेरे लेख पर हम लोग फेसबुक पर चर्चा कर रहे थे कि दिल्ली चुनावों में उत्तराखंडियों को टिकट न मिले तो उन्हें क्या करना चाहिए। राजनीति में लंबा अनुभव रखने वाले और गढ़वाल हितेषिणी सभा के पूर्व अध्यक्ष मनमोहन बुड़ाकोटी का कहना था कि यदि हम एकजुट हो जाएं, तो दिल्ली में किसी की ताकत नही कि वह उत्तराखंडी समाज का मुकाबला कर सके। सुरेंद्र सिंह भंडारी जी तो एक कदम बढ़कर उत्तराखंड में चुने हुए जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी दिल्ली के उत्तराखंडियों के उत्त्थान में देख रहे थे। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत से लंबे समय तक जुड़े रहे नंदन सिंह रावत, जो उत्तराखंड से जुड़े हर यज्ञ में आहुति जरूर देते रहे हैं, का कहना था कि समाज की एकता तब काम में आएगी, जब हममें राजनीतिक काबिलियत होगी। उत्तराखंडियों में राजनीतिक एकता की संभावना मुझे फिलहाल नजर नहीं आती।

मुझे तो निजी तौर पर उत्तराखंड के युवा नेता दीपक द्विवेदी के क्रांतिकारी विचार सबसे ज्यादा अच्छे लगे। उनका कहना है कि हमें योग्य य्ुावा उत्तराखंडियों को चुनाव लड़वाना चाहिए।

तो लीजिए भाई, अब एक युवा उत्तराखंडी अब आ गया है चुनाव के मैदान में। गीदड़ों और लोमड़ियों से भरे चुनावी दंगल में उतरने वाले इस उत्तराखंडी शेर का नाम है - भारत रावत।

भारत का कहना है कि वह उत्तराखंडी समाज की अस्मिता की रक्षा के लिए ऐसे चुनावी मैदान में उतरे हैं, जहां उत्तराखंडी वोटों का प्रतिशत पांच से भी कम है। उनका यह भी कहना है कि वह केवल जीत के लिए चुनावी समर में नहीं उतरे, बल्कि एक बड़े राजनीतिक दल की उत्तराखंड विरोधी नीतियोें की खिलाफत के लिए वह चुनावी मैदान में आए हैं। भारत इस बात से नाराज हैं कि उक्त राजनीतिक दल ने दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से एक में भी किसी उत्तराखंडी को टिकट नहीं दिया। क्या यह हम लोगों के उस दावे का मजाक उड़ाना नहीं है कि दिल्ली में 36 लाख उत्तराखंडी रहते हैं?

मैंने भारत की तुलना शेर के की है तो इसे अतिशयोक्ति अलंकार समझने की भूल न करें। क्या आपको पता है कि भारत ने किसके खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया है? दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को बुरी तरह से पराजित करने वाले आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल को टक्कर देंगे हमारे युवा नेता।

भारत चाहते तो किसी ऐसे चुनावी क्षेत्र को ढ़ूूंढ़ सकते थे, जहां उत्तराखंडी बहुसंख्यक हों और उनके जीतने की संभावना ज्यादा हो। पर भारत एक बड़े राजनीतिक दल को यह दिखाना चाहते हैं कि उत्तराखंडियों की उपेक्षा करना उसके लिए भारी पड़ सकता है।

बात सिर्फ किसी एक राजनीतिक दल की नहीं है। लगभग सभी बड़े राजनीतिक दल उत्तराखंडियों की इसी तरह से घोर उपेक्षा करते रहे हैं। बात उत्तराखंड की हो तो मानो उन्हें मनमानी करने का लाइसेंस ही मिल जाता है। हम लोगों के पूर्वजों और बुजुर्गों ने उत्तराखंड राज्य के लिए आंदोलन किया, पर नवनिर्मित राज्य का नाम उत्तरांचल रख दिया गया। राज्य का पहला मुख्यमंत्री भी हरियाणा मूल का था। चुनाव प्रचार हमेशा हरीश रावत ने किया, क्षेत्र की जनता उन्हें पहचानती थी, पर उनके दल ने मुख्यमंत्री पहले नारायण दत्त तिवारी और बाद में बहुगुणा को बना दिया। सभी बड़े राजनीतिक दल कोई मौका नहीं छोड़ते, हमें हमारी राजनीतिक औकात बताने में।

ऐसे उपेक्षित माहौल में यदि कोई व्यक्ति बड़े राजनीतिक दलों को आईना दिखाने का दुस्साहस करता है, तो उत्तराखंडियों को उसकी भावना का सम्मान करना चाहिए और उसे तन-मन-धन से सहयोग भी करना चाहिए। हमें भारत भाई को बधाई देनी चाहिए उनके द्वारा प्रदर्शित ईमानदारी और साहस के लिए। यह चुनाव लड़ना मात्र ही उनकी सैद्धांतिक विजय साबित होगा।

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