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Tuesday, June 23, 2015

कोडिया-बनास-किमसार मोटर मार्ग के मामले पर जनता को बरगलाना अब संभव नहीं

Uttarakhand News - (सच्चिदानंद शर्मा) जनपद पौड़ी गढ़वाल के विधानसभा क्षेत्र यमकेश्वर में कोडिया -किमसार मोटर मार्ग, जो कि राजा जी राष्ट्रीय पार्क की सीमा में होने के कारण विगत लंबे समय से डामरीकरण की स्वीकृति के लिए लंबित पड़ा है, की सच्चाई जानने के लिए जब मैं 16 जून 2015 को गंगा भोगपुर उक्त मांग की स्वीकृति हेतू धरना स्थल पर बैठे क्षेत्रीय ग्रामीणों व जनप्रतिनिधियों के मध्य पहुंचा, तो वहाँ मामले को लेकर बहुत भ्रम की स्थिति थी । मामले की तह तक पहुंचने के बाद जो सच्चाई सामने आई वह चौकाने वाली है, जिसे सार्वजनिक करना मैं अपना दायित्व समझता हूँ, साथ ही सरकार के जो विभाग इस मार्ग में डामरीकरण में रोड़ा अटकाने की कोशिश कर रहे हैं, वो भी किसी गलतफहमी का शिकार न हों, उन्हें भी वस्तुस्थिति से रू-ब-रू होना ज़रूरी है, अन्यथा पीड़ित जनता यदि न्यायालय की शरण में चली गई, तो उन्हें लेने के देने पड़ संकते हैं।
(Sachidanand Sharma: Ex-state minister in the former BJP Government)
 एक तथ्य जो सामने आया है वह यह है कि कोडिया-बनास-किमसार मार्ग जो कि कोडिया से पहाड़ के रास्ते बनास होते हुए किमसार जाने का मार्ग है, जो सन 1978 में ही लोक निर्माण विभाग को हस्तांतरित होने के पश्चात लोक निर्माण विभाग द्वारा इसका पक्का निर्माण किया गया है । चूंकि इस मार्ग का हस्तांतरण वन (संरक्षण ) अधिनियम 1980 से पूर्व किया गया था, अतः इसके लिए भारत सरकार की पूर्वानुमति की कोई आवश्यकता नहीं थीं। यधपि हस्तांतरित क्षेत्र विधिक रूप से आरक्षित वन व राजाजी राष्ट्रीय पार्क के अंतर्गत स्थित है, तथापि उक्त मार्ग का रखरखाव व प्रबंधन लोक निर्माण विभाग के पास ही रहेगा, इसका पुनः डामरीकरण व मरम्मत आदि कार्य संपन्न करने में कोई विधिक अड़चन नहीं है।

दूसरा तथ्य जो सामने आया वह यह कि कच्चे मार्ग को पक्का कर डामरीकरण पर रोक केवल कोडिया -विन्ध्वासिनी -किमसार वन मोटर मार्ग पर लागू है, जो नदी के किनारे विन्ध्वासिनी होते हुए किमसार तक जाने वाला मोटर मार्ग है। माननीय सर्वोच्च न्यायलय द्वारा गठित सी ० ई ० सी द्वारा कोडिया -विन्ध्वासिनी -किमसार वन मोटर मार्ग के सुदृढ़ीकरण पर रोक लगाई गई थी, ना कि कोडिया -बनास -किमसार मोटर मार्ग पर।
(Sachidanand Sharma speaking before local public)
वर्तमान में प्रदेश सरकार दो पृथक मार्गो के एक जैसे नाम होने के कारण जन आंदोलन को भ्रमित कर रही है। जिस कोडिया-बनास -किमसार मोटर मार्ग के डामरीकरण के लिए जनता आन्दोलनरत है उसके निर्माण में किसी भी प्रकार की वैधानिक अड़चन नहीं है। माननीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भारत सरकार द्वारा उपरोक्त विषयक बयान से अब प्रदेश सरकार की नींद खुल गयी होगी कि रिजर्व फॉरेस्ट व पार्क क्षेत्रों में स्थित वन अधिनियम 1980 से पूर्व के मार्गों पर भारत सरकार का उनके सुदृढ़ीकरण , डामरीकरण , रख रखाव अथवा विकास कार्यों हेतू किसी प्रकार का प्रतिबन्ध ना तो पूर्व में था ना ही वर्तमान में हैं बशर्ते सडकों का विस्तार व चौड़ीकरण आदि कार्यों से पूर्व समस्त औपचारिकता पूर्ण किया जाना आवश्यक होगा।
(Sachidanand Sharma speaking to the press)
अब यदि प्रदेश सरकार केंद्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय का बहाना लेकर कोडिया- बनास -किमसार मोटर मार्ग का डामरीकरण, बिंज नदी पर सेतु व बाढ़ नियंत्रण हेतु तल्ला गंगा भोगपुर में तट बन्धो के निर्माण कार्यो में विलम्ब करती है, तो इसके लिए क्षेत्रीय जनता प्रदेश सरकार को कभी माफ़ नहीं कर सकती। प्रदेश सरकार को सम्बंधित विकास कार्यो में अविलम्ब अपनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, इन मुद्दों पर जनता को और अधिक समय तक बरगलाया नही जा सकता।

(सच्चिदानंद शर्मा उत्तराखंड की पूर्व भाजपा सरकार में राज्यमंत्री थे।)

Tuesday, June 9, 2015

Dobra Chanti Bridge: can you call it a Bridge

Uttarakhand News - Dobra Chanti Bridge has become a never ending story for people of Uttarakhand. The construction is going on for the last eight years and as per several media sources more than 130 crore Rupees have been spent, but local people have got nothing. Just check the picture, do you call it a bridge?
Dobra Chanti Bridge: Bridge or two towers?


Friday, June 5, 2015

कब तक करेंगे प्रकृति से पाखंड

Uttarakhand News - (सच्चिदानंद शर्मा)
Sachidanand Sharma, Raj Nagar, Ghaziabad
विश्व पर्यावरण दिवस पर कुछ लिखने से पहले हिमालयन गौरव कवि गिर्दा की इस रचना का जिक्र  न करना न्यायसंगत नहीं होगा । 

एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ डूबती कश्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।
अजी वाह ! क्या बात तुम्हारी,
तुम तो पानी के व्योपारी,
खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी,
बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी,
सारा पानी चूस रहे हो,
नदी-समन्दर लूट रहे हो,
गंगा-यमुना की छाती पर
कंकड़-पत्थर कूट रहे हो,
उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी,
चलेगी कब तक ये मनमर्जी,
जिस दिन डोलगी ये धरती,
सर से निकलेगी सब मस्ती,
महल-चौबारे बह जायेंगे
खाली रौखड़ रह जायेंगे
बूँद-बूँद को तरसोगे जब -
बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
नगद – उधारी – तब क्या होगा ??
आज भले ही मौज उड़ा लो,
नदियों को प्यासा तड़पा लो,
गंगा को कीचड़ कर डालो,
लेकिन डोलेगी जब धरती – बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी – तब क्या होगा ?
योजनकारी – तब क्या होगा ?
नगद-उधारी तब क्या होगा ?
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

हमें कोई कितना भी आगाह क्यों न करता रहे हम भारतवासी न कभी चेते हैं , न  हैं हम  चेतने  वाले क्योंकि हम हैं ही कुछ निराले !! भयंकर से भयंकर बाढ़ ,भूस्खलन , भूकम्प , बादल फटना ,ओला वृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाओं को झेलने की हमारी नियति अब हमारी मानसिकता बन चुकी है । करोड़ों की आबादी वाले इस देश में प्रतिवर्ष लाखों लोगों के मरने के बाद जो सरकारी कारोबार चलता है इस कटु सत्य से अब हम सब वाकिफ  है । यह सब देखकर लगता है कि  सरकारें भी अब गिद्ध की  तरह प्राकृतिक आपदा के आने  का इंतज़ार कर रही होती हैं । अधिकांश गैर सरकारी संस्थान पर्यावरण रक्षा के  नाम पर सरकारी तंत्र से घाल - मेल करके राजस्व को दोहने का कार्य कर रहे हैं । आज हिमालय व् हिमालयी  राज्यों का अस्तित्व खतरे में है । प्राकृतिक ,सामाजिक ,राजनैतिक व् सामरिक दृष्टिकोण से यह राज्य अत्यंत संवेदनशील बने हुए हैं । पर्यावरण के नाम पर हम अक्सर अपने हिस्से के हिमालय और गंगा की चिंता करते हुए नज़र आते हैं जबकि सच यह है कि यदि हिमालय को बचाना है तो हमें पूरे हिमालय व् उसके गर्भ में बसे अपने पर्वतीय प्रदेशों जैसे जम्मू- कश्मीर, हिमांचल ,उत्तराखंड ,मिजोरम , मणिपुर ,मेघालय ,अरुणाचल ,असम , नागालैंड व् त्रिपुरा के स्वरुप का भी चिंतन करना पड़ेगा । हमें गंगा के अस्तित्व को बचाने के साथ - साथ चिनाब ,सतलुज ,रावी ,यमुना ,व्यास , काली गंगा ,शारदा ,लाछू ,लोहान , दीदक ,ढुधनाई , चीनारी , तुरैल , तुवाल , दिवांग , गोमती ,त्रिपुरा ,कामिंग , भरौली , सुवानसीरी , बारक , धनसिरी , दिहिंग ,लोहित आदि जीवन दायिनी नदियों का संरक्षण व् संवर्धन करना अत्यंत आवश्यक  है जिनका उद्गम स्थान हिमालय है । प्रतिवर्ष हिमालय इन नदियों के अतिरिक्त लगभग १० करोड़ क्यूबिक मीटर जल एशिया महाद्धीप  के अन्य देशों को भी देता है ,इसलिए हिमालय को एशिया महाद्धीप  का वाटर टैंक भी कहा जाता है । यदि  सरकार की उपेक्षित नीतियाँ  व् पर्यावरण का मानवीय दोहन इसी प्रकार जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब चिरस्थायी ये नदियां अपना मौलिक स्वरुप खोकर नाममात्र ही रह जायेंगी । 

जब - जब सरकार विकास के नाम पर पहाड़ों पर रेल दौड़ने की बात कहती है तो मेरी रूह कांपने  लगती है । भौगोलिक दृष्टिकोण से हिमालय के ये कच्चे पहाड़ वलित पर्वत श्रेणी की श्रंखला में आते हैं जो अभी भी निर्माणाधीन हैं । भूगर्भीय हलचलों के कारण प्रत्येक वर्ष हिमालय की ऊंचाई बढ़ती जा रही है । आज से लगभग सात करोड़ वर्ष पूर्व यहाँ  टेथिस नामक सागर लहराया करता था जो कि यूरोप व् एशिया महाद्धीप से आने वाली नदियों के अवसाद से भरता गया और  आज वह हिमालय के स्वरुप में हमारे सामने विद्यमान है । सरकार द्धारा यदि  इन कच्चे पहाड़ों को काटकर अथवा टन्नल बनाकर ट्रैन  की पटरी बिछा कर उस पर ट्रैन दौड़ाई  जाती हैं तो इसके परिणामस्वरूप होने वाले विनाश की कल्पना ही की जा सकती है । यह सुखद अहसास है कि आज सरकार की जन व् पर्यावरण विरोधी नीतियों के खिलाफ जनमानस चेत रहा है । वृक्षों को अपनी संतान की तरह पालने वाले यहाँ  के ग्राम वासी अपने जल -जंगल व् जमीन को बचाने के लिए मुखर हो रहे हैं । वीर भड़ श्री माधो सिंह भंडारी  जी की जन्मस्थली मलेथा को बचाने के लिए  वहाँ पर लगे अवैध खनन  क्रेशरों  का विरोध इसका ज्वलंत प्रमाण है।

मै सदैव जल जंगल व् जमीन से स्थानीय क्षेत्रवासियों को प्राप्त होने वाले हक़ हक़ूब व  ' प्राकृतिक सुखाधिकार ' का प्रबल पक्षधर रहा हूँ । सरकार की जन विरोधी नीतियां - कि वह स्थानीय क्षेत्रवासियों को जंगल से एक गठ्ठर सूखी लकड़ी,पशु चारे के लिए पत्तियाँ  व नदियों के तटों से एक मुट्ठी रेत - पत्थर ,यहां तक कि बाढ़ में  बह कर आयी वन वृक्षों की टहनियों तक को ले जाने के लिए प्रतिबन्ध लगाती है, जिसका मैं घोर विरोधी हूँ । बाढ़  में बह कर आई करोड़ों रुपये की वन सम्पदा योंही सड़ - गलकर नष्ट हो जाती है , न तो सरकार ही समय पर  उसका सदुपयोग करती है और नाही स्थानीय लोगों को करने देती है । पर्यावरण की सुरक्षा तभी संभव है जब वहाँ निवास करने वाला जनजीवन भी सुरक्षित रहेगा और उनके सुखाधिकार भी सुरक्षित होंगे । आज विश्व पर्यावरण दिवस  पर मेरा हर एक  हिमालय वासी से विनम्र निवेदन है कि वे प्रति माह के हिसाब से वर्ष में बारह वृक्ष अवश्य लगाएं इससे हमारी हरी भरी धरती का सपना साकार होगा । प्रकृति प्रेमी वर्ड्सवर्थ  की ये पंक्ति हमें सदैव याद रखनी चाहिए कि "प्रकृति कभी उसको  धोखा नहीं देती जो उससे प्रेम करता है ।" 

Saturday, May 30, 2015

आखिर कब तक हमारा शोषण करते रहेंगे नेता

Uttarakhand News - दोस्तो हमारे उत्तराखन्ड के विकास के लिए कोई रोडमैप ही नही बना हैं.....! यह समस्या पूरे उत्तराखण्ड में व्यापक रुप से मौजूद है, जब तक उत्तराखण्ड के लिये राज्य सरकार द्वारा कोई रोडमैप तैयार नही होता विकास गति को आगे बढाना बेहद मुश्किल कार्य है समझने का प्रयास कीजिए.....! कब बनेगा और कौन बनायेगा.....! जनता का शोषण कब तक करेंगे हमारे स्थानीय नेता ....!

इन विचारों को हमारे सम्मुख रखने वाले लेखक हैं, अल्मोड़ा के किशन सिंह भंडारी। 

Kishan Singh Bhandari
Village & Post Manhet Molekhal Salt Block Distt Almora Uttrakhand. Pin 263667 Cont. No..+919958953879

उत्तराखंड में आपदा का मतलब नौकरशाही/नेताओं/ठेकेदारों/दलालों की पौ-बारह

Uttarakhand News - (भरत रावत) - जून 2013 में जब उत्तराखंड भीषण आपदा से जूझ रहा था, केदारघाटी में लाशों के ढे़र लगे थे, जान बचाने का संघर्ष चल रहा था और लोग भूख-प्यास से बिलबिला रहे थे। उस समय राहत एवं बचाव में लगे अधिकारी महंगे होटलों में रात गुजार भोजन में लजीज व्यंजन (चिकन-मटन-अंडे, मटर-पनीर व गुलाब-जामुन) का स्वाद ले रहे थे।
फोटो व आलेख: साभार भरत रावत।
जून 2013 की उत्तराखंड त्रास्दी में पीड़ितों को राहत के पहुंचाने गए कार्मिकों ने किस तरह सरकारी खर्चे पर मौज उड़ाई और राहत कार्यों में अनियमितताएं बरतीं, यह जानकारी आरटीआइ कार्यकर्ता देहरादून निवासी भूपेंद्र कुमार के अथक प्रयास के बाद ही सामने आ पाई।

आपदा के समय जिस तरह लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए तड़प रहे थे, उसे देखते हुए उनके मन में आपदा राहत कार्यों की सच्चाई जानने का ख्याल आया। इसके लिए उन्होंने रुद्रप्रयाग, चमोली, उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ व बागेश्वर के जिलाधिकारियों से आरटीआई में सूचना मांगी। आशंका के अनुरूप उन्हें सूचनाएं लेने में डेढ़ साल का लंबा समय लग गया।

सूचना के लिए उन्हें सूचना आयोग का दरवाजा भी खटखटाना पड़ा।

देहरादून के नेहरू कालोनी निवासी भूपेंद्र कुमार जनहित के मुद्दों पर पहले भी मुखरता के साथ आरटीआई के तहत लड़ाई लड़ चुके हैं। सौ से अधिक सूचना के अधिकार के आवेदन लगा चुके भूपेंद्र कुमार तमाम मसलों पर फाइलों में दफन सच्चाई को न सिर्फ बाहर निकालने में सफल रहे, बल्कि सिस्टम को अपेक्षित कार्रवाई के लिए मजबूर भी करते रहे।

उन्होंने बताया कि कुछ हालिया सूचनाओं पर उनके प्रयास से कैदियों को पेशी पर लाने वाले पुलिसकर्मियों के लिए दोपहर के भोजन की व्यवस्ता की जा चुकी है। लावारिस शवों के दाह संस्कार के लिए तीन हजार रुपये की व्यवस्था जैसा भी निर्णय भी सरकार से किया जा रहा है। यही नहीं पेशी पर आने वाले कैदियों के लिए फल आदि की व्यवस्था भी उनके प्रयास से परवान चढ़ी।

Sunday, May 24, 2015

हरीश रावत सरकार को फिर से सीखना होगा जनहित का पाठ

Uttarakhand News - एक भाई घनेंद्र सिंह रावत ने आज मुझे किसी समाचारपत्र की कटिंग भेजी, पर कहा कुछ नहीं। उसमें लिखे समाचार को पढ़ने के बाद मुझे समझ में आ गया कि रावत जी को औऱ कुछ बताने की जरूरत भी नहीं थी।

दरअसल समाचार में बताया गया था कि गढ़वाल के यमकेश्वर प्रखंड के ग्रामीण गंगा भोगपुर में क्रमिक अनशन में बैठे हैं। ग्रामीणों की तीन-सूत्री मांगें हैं - बीन नदी पर पुल, कौड़िया-किमसार मौटरमार्ग और बाढ़ सुरक्षा के लिए तटबंध का निर्माण। उक्त समाचार के अनुसार राजाजी राष्ट्रीय टाइगर रिजर्व पार्क प्रभावित संघर्ष समिति का क्रमिक अनशन 13 वें दिन भी जारी रहा। शनिवार, 23 मई, को शाम के वक्त अनशनकारी सरिता देवी की तबियत इतनी खराब हो गई कि उन्हें ऋषिकेश स्थित राजकीय चिकित्सालय पहुंचाना पड़ा। अनशनकारियों ने घटना की जानकारी सिविल पुलिस व राजस्व पुलिस को भी दी, पर खबर के अनुसार देर शाम तक कोई वहां नहीं पहुंचा।

आश्चर्य और उससे भी ज्यादा यह दुख की बात है कि ऐसी मांगों के लिए उत्तराखंंड की जनता को अनशन करना पड़ता है। ये हालात केवल यमकेश्वर ब्लॉक के नहीं हैं। अल्मोड़ा के सल्ट क्षेत्र की जनता ने भी कुछ महीनों पूर्व दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन किया था और कैंडल-मार्च निकाला था। टिहरी गढ़वाल की जनता डोबरा-चांटी पुल के निर्माण की मांग को लेकर रैलियों पर रैलियां कर रही है।

हरीश रावत के राज में उत्तराखंड की जनता आज त्राहि-त्राहि कर रही है। राज्य सरकार उत्तराखंड को विकास के पथ पर पीछे धकेलने में जुटी प्रतीत हो रही है। उत्तराखंड के लोग पानी, बिजली, शिक्षक और रोजगार के अभाव से त्रस्त हैं। आपदाग्रस्त क्षेत्रों में खनन के ठेके बांटने में जुटी हरीश रावत सरकार क्या जनता के हित को प्राथमिकता देना सीखेगी? 

Saturday, May 23, 2015

Tallest Dam in India: Uttarakhand's Tehri Dam

Uttarakhand News - Uttarakhand's Tehri Dam is the tallest dam in India. This photo was clicked on a cold morning and the water is not visible because of a thin layer of fog enveloping it.

Tuesday, May 19, 2015

Uttarakhand; Eternal Ganga at Hardwar

Uttarakhand News -- The Eternal Ganga at Hardwar

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Wednesday, April 22, 2015

उत्तराखंड के 'मां, माटी और मिशन' की 'अपणू दगै भेंट'

Uttarakhand News -  उत्तराखंड का "मां, माटी और मिशन" एक अत्यंत महत्वाकांक्षी आंदोलन प्रतीत होता है, जिसके द्वारा भुवन जोशी "भास्कर" और पूरन घुघत्याल "प्रेम" राज्य का चेहरा बदल देना चाहते हैं। हममें से बहुत से लोगों ने "मां, माटी और मिशन" के बारे में पहले भी पढ़ा और सुना होगा। कुछ ने इसे उन हजारों संगठनों में से एक समझा होगा, जो हर रोज जन्म लेते हैं और कुछ समय बाद असमय ही दम तोड़ देते हैं, पर ज्यादातर लोगों का मानना है कि "मां, माटी और मिशन" कुछ हटकर है और इससे जुड़े लोगों में कुछ कर गुज़रने का जुनून है।


यह जुनून भुवन जोशी और पूरन घुघत्याल को सही दिशा में आगे बढ़ने का उत्साह प्रदान करता है। इन लोगों से बात करते वक्त ही लगता है कि ये लोग अभूतपूर्व ऊर्जा से भरे हुए हैं और यही ऊर्जा है, जिसकी वजह से कुछ महीने पूर्व संगठन के कार्यकर्ताओं ने मुझे लगभग राज़ी कर लिया था कि मैं दिल्ली से रामनगर जाकर उनकी बैठक में शामिल होऊं। मेरा मानना है कि उत्तराखंड की भलाई के लिए "मां, माटी और मिशन"  के बैनर तले कुछ-न-कुछ सकारात्मक काम ज़रूर किये जाएंगे।

आपका यह प्रश्न करना स्वाभाविक ही है कि आखिर जिसकी मैं इतनी तारीफ कर रहा हूं, उस संगठन का मिशन क्या है। संगठन ने दावा किया है कि वह निम्न उद्देश्यों के लिए समर्पित है:--

1. महिलाओं की पूर्ण सुरक्षा
2. गाय माता का पूर्ण संरक्षण और गाय माता को राष्ट्रमाता घोषित करवाना
3. उत्तराखंड सरकार से यह मांग करना कि वह किसानों को खेती के लिए सहायता उपलब्ध कराए
4. उत्तराखंड से पलायन रोकने और स्थानीय युवाओं को अपने राज्य में ही रोज़गार दिलाने की दिशा में काम करना
5. भ्रष्टाचार मुक्त उत्तराखंड
6. नशा मुक्त उत्तराखंड

स्पष्ट है कि उद्देश्य पवित्र हैं और उत्तराखंड व उत्तराखंडियों का हित ही उनके केंद्र में है। तो अगर आपको भी लगता है कि ऐसे संगठन अपने उद्देश्य में सफल हों, तो मेरा मानना है कि आपको अपनी उपस्थिति दर्ज करवाकर उनका मनोबल ज़रूर बढ़ाना चाहिए।

कार्यक्रम का स्थान है -- गढ़वाल भवन, , वीर चंद्रसिंह गढ़वाली चौक, पंचकुइयां रोड, नई दिल्ली

कार्यक्रम 26 अप्रैल को सुबह 10 बजे से है।

तो रविवार के दिन उत्तराखंड की भलाई की इच्छा रखने वालों का समर्थन करने मैं गढ़वाल भवन समय पर पहुंच जाउंगा।

Saturday, April 18, 2015

तांत्या टोपे को कृतज्ञ देशवासियों की श्रृद्धांजलि

Uttarakhand News - इस बार एक सुखद आश्चर्य यह देखने में आ रहा है कि अधिकांश राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता भी भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्राणों की आहुति देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर रहे हैं। याद पहले भी किया करते थे, पर यह स्मृति गांधी जी,  पंडित नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और सावरकर आदि तक सीमित रहती थी। इस बार तो आज़ादी की लड़ाई के हर सिपाही को श्रृद्धा-सुमन अर्पित करने की होड़-सी मची हुई है।
शायद कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि यदि भाजपा नेताओं ने पहले आंसू बहा दिए, तो राजनीतिक लाभ वे उठा ले जाएंगे जैसाकि उन्होंने सरदार पटेल औऱ मालवीय के मामले में किया, इसलिए कांग्रेसी नेता भी पीछे नहीं रहना चाहते।

अच्छी बात यह है कि अब तांत्या टोपे जैसे आज़ादी की लड़ाई के महान सिपाही को सारे देश में याद किया जा रहा है। उत्तराखंड में भी भारत की पहली आजादी की लड़ाई के महानायक तांत्या टोपे की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रृद्धांजलि दी जा रही है। तांत्या टोपे के बारे में सभी लोग जानते हैं, पर दो लाइनें मैं लिखना ज़रूर चाहूंगा। इस शहीद का पूरा नाम था - रामचंद्र पांडुरंग टोपे औऱ उनका जन्म 1814 में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह 1857 में अंग्रेजों से बुरी तरह घिरी हुई वीरांगना रानी लक्ष्मी बाई की मदद के लिए अपनी सेना के साथ ग्वालियर गए थे, पर देश के गद्दारों की वजह से पराजित हुए। इन्हें अंग्रेजों ने 18 अप्रेल 1859 के दिन फांसी दे दी। आइये हम सब भी मिलकर इस शहीद को श्रृद्धा सुमन अर्पित करें।

Friday, April 3, 2015

उत्तराखंड की युवा पीढ़ी को चाहिए समाज में सम्मानजनक स्थान

Uttarakhand News - उत्तराखंड की युवा पीढ़ी अब भारतीय समाज में एक गौरवपूर्ण स्थान चाहती है। कुछ कर गुज़रने की ऊर्जा से भरे इन युवाओं में 25 साल से लेकर 50 साल तक के लोग भी शामिल हैं। आप कहेंगे कि 50 साल का व्यक्ति युवा कैसे? दरअसल, बात जब जातियों और पीढ़ियों की हो रही हो, तो हम इस आयु सीमा के लोगों को एक ग्रुप में रख सकते हैं। इस आयु समूह के अधिकांश लोग आरंभिक संघर्ष के बाद किसी-न-किसी रोजगार में लग चुके होते हैं और पेट भरने से आगे की बातें उनके दिमाग में आने लगती हैं।

पहले क्या छवि थी उत्तराखंडी समाज के लोगों की

भारत की आज़ादी के बाद दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में भारी संख्या में सरकारी और निजी क्षेत्र के कार्यालय खुले, तो पंजाबी, मराठी, बंगाली और दक्षिणी भारत के लोगों ने महत्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमा लिया, क्योंकि वे पढ़े-लिखे थे औऱ अपनी जाति के लोगों को आगे बढ़ाने की इच्छाशक्ति उनमें कूट-कूटकर भरी थी। उत्तराखंडी समाज गढ़वाली-कुमाऊंनी, राजपूत-ब्राह्मण, ऊंची जाति के ब्राह्मण और ऊंची जाति के राजपूत जैसे निरर्थक खांचों में बंटा हुआ था। इस बंटे हुए समाज को काम मिला चपरासी, कुक, घरों में काम करने वाले नौकरों, मैकेनिकों के सहायकों और फील्ड जॉब करने वालों का। इससे उत्तराखंडी समाज की छवि ही ऐसी बन गई कि वे चपरासी या कुक होते हैं। दिल्ली के अनेक इलाकों में उत्तराखंडियों को गढ़वाली कहा जाता है। गढ़वालियों की सबसे बड़ी खूबी माना जाता है, उनका ईमानदार होना। आप समाचारपत्रों के क्लासिफाइड्स कॉलम में नौकरों, सहायकों और चपरासियों की नौकरी में अक्सर गढ़वालियों को प्राथमिकता देने की बात पढ़ सकते हैं, क्योंकि वे ईमानदार होते हैं। दुख की बात यह है कि उत्तराखंडियों को मैनेजर या वीपी या प्रेज़िडेंट पद के लिए प्राथमिकता नहीं दी जाती?

आज उत्तराखंडी लड़ रहे हैं पहचान के संकट की लड़ाई

पिछले दसेक सालों में हालात में कुछ बदलाव आए हैं। चपरासियों, सहायकों और अन्य कम वेतन वाले पदों पर काम करने के बावजूद उत्तराखंडियों ने अपने बच्चों को अच्छी तालीम दिलाई। पढ़े-लिखे उत्तराखंडी बच्चे नौकरी करने विदेश गए, भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में उन्होंने जगह बनाई, निजी क्षेत्र में भी मैनेजर, वीपी और डायरेक्टर जैसे पदों तक वे पहुंच गए। अब उत्तराखंडी समाज को अपने ऊपर लगे ईमानदार कुक या चपरासी के ठप्पे को हटाने की ज़रूरत पड़ रही है। जो लोग कमज़ोर मानसिकता के थे, उन्होंने खुद को उत्तराखंडी बताना ही बंद कर दिया। बाकी लोग भारत के हर महानगर में पहचान के संकट की लड़ाई लड़ रहे हैं। हर महीने एक नया संगठन बना रहे हैं उत्तराखंडी समुदाय के लोग। हाल ही में दिल्ली विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड एकता मंच का गठन किया गया, जिसमें 150 से ज्यादा उत्तराखंडी सामाजिक संगठनों की भागीदारी का दावा किया गया था।

दिल्ली में पहचान की पहली लड़ाई हम हार गए

उत्तराखंडियों के एकजुट होने और दिल्ली में करीब 15 लाख उत्तराखंडी मतदाता होने के दावों के बावजूद कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी ने हम लोगों की चुनावों में उम्मीदवार नहीं बनाया। सामंतशाही मानसिकता के लोगों को शायद यह लगता होगा कि चपरासी और कुक जैसे काम करने वाले उत्तराखंडियों को तो राजनीतिक कार्यक्रमों में दरी बिछानी चाहिए, ताली बजानी चाहिए, भीड़ का हिस्सा बनना चाहिए, न कि मंच पर खड़े होकर भाषण देने के सपने देखने चाहिए। स्पष्ट है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में उत्तराखंडियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में टिकट नहीं मिले। कांग्रेस और भाजपा ने एक-एक उत्तराखंडी को उम्मीदवार बनाया, जबकि आम आदमी पार्टी ने एक को भी टिकट नहीं दिया।

उत्तराखंडी अस्मिता की रक्षा की लड़ाई जारी है

आज जब मैं उत्तराखंडी युवाओं से बात करता हूं, तो महसूस करता हूं कि उत्तराखंडी अस्मिता की रक्षा की भावना उनके दिल में सुलग रही है। दिल्ली के उत्तराखंडियों ने 2017 में होने वाले दिल्ली नगर निगम के चुनावों के लिए अभी से कमर कसनी शुरु कर दी है। मैं यहां किसी का नाम लिखना नहीं चाहूंगा, पर सच यह है कि ऐसे उत्तराखंडी कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी, सभी राजनीतिक दलों में हैं, जो टिकट न मिलने की स्थिति में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भी चुनाव लड़ने को तैयार हैं। यही आत्मविश्वास है, जो उत्तराखंडियों को, आज नहीं तो कल, दिल्ली व अन्य महानगरों की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में उन्हें उनका यथोचित स्थान ज़रूर दिलाएगा।

Saturday, March 28, 2015

क्या स्वयंभू ईमानदार पार्टी की बैठक बन गई गुंडों का जमावड़ा

Uttarakhand News - कहते हैं सत्ता निरंकुश होती है। सत्ता इन्सान का दिमाग खराब कर देती है। सत्ता के लिए दोस्त ही दोस्त का दुश्मन हो जाता है। सत्ताधारी नेता सारी ताकत अपने हाथ में रखना चाहता है और साम-दाम-दंड-भेद किसी भी तरह विरोधियों का संपूर्ण सफाया करने को तत्पर रहता है।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में आज जो कुछ होने का आरोप योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण लगा रहे हैं, उससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि ईमानदार पार्टी होने का दावा करने वाला दल वास्तव में भाड़े के गुंडों का जमावड़ा गया है। बताया जाता है कि बैठक में लगभग 300 लोग थे और सिर्फ आठ लोगों ने योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार और अजीत झा को पाट्री की राष्ट्रीय कार्यसमिति से निकालने का विरोध किया। योगेंद्र यादव ने तो यह भी दावा किया कि 167 सदस्यों से पहले ही हस्ताक्षर करा लिए गए थे। बैठक पूरी तरह से स्क्रिप्टिड थी।

योगेंद्र यादव ने आगे कहा - बैठक में बाउंसर बुलाए गए थे और हमारे साथी को धसीटा गया।

प्रशांत भूषण ने कहा - न्यूट्रल अॉबसर्वर को बैठक में बुलाया नहीं गया, पार्टी के लोकपाल को बैठक में आने से मना कर दिया।

प्रो. आनंद कुमार ने कहा - मैं बैठक में बोलना चाहता था, पर अपनी बात रखने का मौका भी नहीं दिया गया। रहमान साहब को बैठक में चोट लगी, उन्हें ई-रिक्शा में बैठकर लाना पड़ा। मैं अब आम आदमी पार्टी का आम वालन्टियर हूं, उसी के तहत पार्टी में योगदान दूंगा।

पंजाब से आम आदमी पार्टी के सांसद धर्मवीर गांधी और दिल्ली के दो विधायकों (पुष्कर और देवेंद्र सहरावत) ने प्रस्ताव का विरोध किया। आम आदमी पार्टी के लिए शुरुआत से खून-पसीना एक करने वाले रमजान चौधरी ने टीवी चैनलों के कैमरों के आगे दयनीय और लुटी-पिटी हालत में कहा - मुझे जूतों से पीटा गया।

उधर, आम आदमी पाट्री के नेता आशुतोष ने कहा - योगेंद्र यादव झूठ बोल रहे हैं, बैठक में कोई मार-पीट नहीं हुई।

सच क्या है और झूठ क्या है, यह तो सिर्फ वही लोग जानते है जो कि बैठक में बंद दरवाज़े के अंदर बैठे थे, पर यह तो सच है कि कल जारी किए गए एक स्टिंग में यही सबकुछ करने की बात आआपा के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कही थी। अगर योगेंद्र यादव और साथियों पर भरोसा किया जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि जिस दल ने सार्वजनिक जीवन में शुचिता और ईमानदारी की बात करके चुनाव में जीत हासिल की थी, उसका दामन पूरी तरह से साफ नहीं है।

आम आदमी पार्टी वही महान राजनीतिक दल है, जिसने दिल्ली के 36 लाख उत्तराखंडियों की घोर उपेक्षा करते हुए, दिल्ली विधानसभा चुनावों में एक भी उत्तराखंडी को उम्मीदवार नहीं बनाया था। केवल उत्तराखंडी ही नहीं, बल्कि आज तो दिल्ली का आम मतदाता पछता रहा होगा कि पांच साल के लिए अपना भविष्य उसने कैसे लोगों के हाथों में सौंप दिया है।

Thursday, March 26, 2015

उत्तराखंड कांग्रेस कमेटी के नए कर्णधार क्या भला करेंगे कांग्रेस का

Uttarakhand News - कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, जनार्दन द्विवेदी, ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके सूचना दी है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस के पदाधिकारियों और कार्यकारी समिति के लिए मनोनीत सदस्यों के नामों को अपनी स्वीकृति दे दी है।

जिस तरह से कांग्रेस ने भारी संख्या में उपाध्यक्ष और महासचिव व सचिव पद बांटे हैं, उससे लगता है कि सूची बनाते समय सभी प्रभावशाली गुटों को खुश करने की भरपूर कोशिश की गई है। वैसे भी पहले केंद्र और उसके बाद एक-एक करके कई राज्यों में बुरी तरह से शिकस्त खाने के बाद कांग्रेस के पास कोई और चारा ही नहीं बचा है। अब तो जो साथ हैं, उन्हें खुश रखा जाए इसी में भलाई है, वरना डूबती हुई नाव में सवारी कौन करना चाहेगा।

देश की राजनीति के महासमुद्र में फिलहाल कांग्रेस की नाव डूबती नज़र आ रही है, पर फिर भी उत्तराखंड कांग्रेस के पद बांटने में भाई-भतीजावाद को पूरा प्रश्रय दिया गया है। आप सूची में दर्ज नाम पढ़ेंगे, तो खुद ही समझ जाएंगे कि उत्तराखंड की राजनीति में कांग्रेस के सबसे बड़े नाम से लेकर उनके सिपहसालारों के रिश्तेदारों तक सभी को उत्तराखंड कांग्रेस के पदों की बंदरबांट का लाभ मिला है। इस बंदरबांट का क्या लाभ कांग्रेस को 2017 के विधानसबा चुनावों में मिलेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

खैर विज्ञप्ति में दर्ज सूचना के अनुसार प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद किशोर उपाध्याय के पास ही रहेगा, जबकि सुनील गुलाटी को कोषाध्यक्ष पद दिया गया है।

उपाध्यक्ष पद निम्न लोगों को दिया गया है - रवींद्र जैन, महेंद्र पाल, एसपी सिंह, अब्दुल रजा, रण विजय सिंह सैनी, ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी, जोत सिंह बिष्ट, भगीरथ भट्ट, राम प्रसाद टम्टा, शेरसिंह नौलिया, शंकर चंद रमोला, शिवकुमार मित्तल, सुरेश वाल्मीकि, जया बिष्ट, सरदार साहेब सिंह, काजी निजामुद्दीन, संतोष चौहान, रमेश पांडे, शकुंतला दत्ताल, भुवन नौटियाल, हलदर, मनोहर लाल शर्मा।

महासचिव पद पाने वाले लोगों के नाम हैं - राजेश जुवांठा, करण मेहरा, ओपी चौहान, अरेंद्र शर्मा, राजपाल खरोला, राजपाल बिष्ट, आनंद रावत, ज्योति नेगी, दिनेश व्यास, अनुपम शर्मा, डा. केएस राणा, डा. इरशाद, जगत लाल खाती, खजान पांडे, मोहन पाठक, हरीश पनेरू, घनानंद नौटियाल, गोदावरी थापली, रामसिंह केरा, विजय सिजवाली, यामीन अंसारी, शिल्पी अरोड़ा, सुबोध राकेश, सतपाल ब्रह्मचारी, जयपाल जाटव, मास्टर सतपाल, प्रदीप बागवारी, नवीन जोशी।

सचिव पद की शोभा बढ़ाने वाले लोगों के नाम हैं - सुलेमान अंसारी, सुनीता प्रकाश, दीप सती, तारक बंसल, दलजीत गुराया, राजकुमार शाह, संजय किशोर, ललित जोशी, विवेक डोबरियाल शर्मा, शराफत खान, लता जज, अनुपमा रावत, ममता गुरंग, मंजू डोभाल, गोपाल चमोली, दिलशाद कुरैशी, विमल सजवाण, महेश शर्मा, ज्योति रौतेला, नत्थीलाल शाह, महेंद्र सिंह नुंथी, कुमुद शर्मा, मूर्ती सिंह नेगी, राम पांडे, सूरज राणा, जयप्रकाश नौटियाल, अशोक धीमान, गणेश उपाध्याय, राजेंद्र कंडवाल, संजय डोभाल, दीप बोहरा, पूनम भगत, अश्वनी कुमार, मीना बछावन, ताहिर अली, महेश जोशी, दानसिंह राणा, आशा टम्टा, मोहन गोस्वामी, पुष्पा गोस्वामी।

Monday, March 23, 2015

हिम उत्तरायणी पत्रिका के लोकार्पण समारोह के बहाने एक साहित्यिक योगी से मुलाकात

Uttarakhand News - पांचजन्य के सहयोगी संपादक सूर्य प्रकाश सेमवाल और उत्तराखंड के सुप्रसिद्ध सोशल एक्टिविस्ट और कांग्रेस नेता नंदन सिंह रावत ने जब मुझे हिम उत्तरायणी के लोकार्पण समारोह में आमंत्रित किया, तो मुझे बहुत खुशी हुई कि उत्तराखंडी समाज अपनी संस्कृति और साहित्य को लेकर कितना जागरुक है। हिम उत्तरायणी का अर्थ मैंने अपनी जानकारी के हिसाब से कर लिया, क्योंकि नंदन सिंह रावत उत्तरायणी पर्व के दिन को राजकीय अवकाश घोषित करवाने के लिए लंबे समय से संघर्षरत हैं। कार्यक्रम मेरी उम्मीद से ज़्यादा लाभकर सिद्ध हुआ।
महान साहित्यिक योगी डॉ नरेंद्र कोहली का सम्मान करते नंदन सिंह रावत
रविवार, मार्च 22, 2015 को अटल सहयात्रियों का अभिनंदन एवं हिम उत्तरायणी पत्रिका का लोकार्पण समारोह कार्यक्रम में भाग लेने मैं नंदन सिंह रावत और उत्तराखंड के युवा कलाकार मयंक आर्या के साथ 3 बजे दीनदयाल उपाध्याय मार्ग पर स्थित अणुव्रत भवन में पहुंचा और हमें वहां अनेक महान साहित्यकारों, शिक्षाविदों और राजनीतिज्ञों के सान्निध्य का अवसर प्राप्त हुआ।
जब हमने यथोचित रूप से सुसज्जित और पवित्रता से नहाए चमचमाते हॉल में प्रवेश किया, तो वातावरण में राजनीतिक गहमागहमी की हल्की-सी गर्माहट-सी थी। वहां खुसर-पुसर हो रही थी कि पता नहीं मुरली मनोहर जोशी कब तक पहुंचेंगे। लेकिन कुछ ही समय बाद धीरे-धीरे वातावरण में साहित्य की पवित्रता किसी पुष्प की सुगंध की तरह फैल गई। एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक हॉल में बैठे सभी लोग मंत्र-मुग्ध होकर पहले युवा कवि राधाकांत पांडे का कविता पाठ और उसके बाद मूर्धन्य साहित्यकार और हिंदी में नई कहानी आंदोलन के एक सशक्त हस्ताक्षर डॉ नरेंद्र कोहली के संस्मरणात्मक संबोधन को सुनने लगे।

बाद में कार्यक्रम के आयोजक सूर्य प्रकाश सेमवाल ने स्पष्ट कर दिया कि मुरली मनोहर जोशी की अनुपस्थिति में डॉ कोहली ही कार्यक्रम के मुख्य अतिथि रहेंगे, तो एक तरह से मुझे तो अच्छा ही लगा। नेताओं को तो हम हमेशा सुनते हैं, पर पौराणिक चरित्रों को लेकर आधुनिक महाकाव्यों की रचना करने वाले डॉ कोहली को सुनना कलयुग में पुण्य कमाने जैसा ही है। डॉ कोहली ने अटल बिहारी वाजपेयी के साथ बिताया समय याद किया, बताया कि कितने सहृदय हैं अटल जी, समझाया कि वे वास्तव में कवि हृदय हैं और व्याख्यायित किया कि अटल जी वक्त के साथ बड़े, और बड़े राजनेता होते गए, पर एक व्यक्ति और मित्र के रूप में वह कभी नहीं बदले।

कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री डॉ श्याम सिंह शशि ने की और उन्होंने भी अटल जी के साथ बिताए वक्त को बहुत शिद्दत औऱ अत्यंत भावुकता से याद किया। कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ नवीन कुमार जग्गी, अणुव्रत के प्रबंधक नहाटा जी और राधा कृष्ण मनोड़ी ने भी विचार व्यक्त किए। अटल जी के साथ सालों तक रहे उनके सहयोगियों का स्वागत भी इस अवसर पर किया गया, इनमें महान उत्तराखंडी साहित्यकार डोभाल जी भी शामिल थे।
जगदीश मंमगाईं को सम्मानित करते डॉ नरेंद्र कोहली
वास्तव में उत्तराखंड का समुचित प्रतिनिधित्व इस दौरान देखने में आया। दिल्ली में उत्तराखंडियों का नेतृत्व करने वाले एकीकृत एमसीडी की कंस्ट्रक्शन कमेटी के पूर्व चेयरमैन व भाजपा नेता जगदीश ममगाईं, डीपीएमआई के ओनर व भाजपा नेता डॉ विनोद बछेती, नंदन सिंह रावत, अनिल कुमार पंत, पत्रकार वेद उनियाल और रविंद्र बिष्ट भी इस मौके पर वहां उपस्थित थे। कार्यक्रम के आयोजकों ने उन सभी को डॉ कोहली के हाथों शॉल और स्मृति-चिह्न प्रदान करवाकर कराया। मैं तो हैरान था कि मुझे भी इस अवसर पर इसी तरह से सम्मानित किया गया। डॉ कोहली का हाथ अपने कंधे पर महसूस करके मैंने वह अनंत व अलौकिक ऊर्जा भी अनुभव की, जिसने साहित्य के इस महान पुरोध को 100 से अधिक पुस्तकें लिखने का साहस और योग्यता प्रदान की।
डॉ विनोद बछेती को स्मृति-चिह्न प्रदान करते डॉ कोहली। 
अनिल कुमार पंत को स्मृति-चिह्न प्रदान करते पद्मश्री डॉ श्याम सिंह शशि। 
नंदन सिंह रावत का भी एक अलग ही रूप इस मौके पर देखने को मिला। कम से कम मैं तो हैरान रह गया, जब सेमवाल जी ने मंच से घोषणा की कि हिम उत्तरायणी पत्रिकता से सह संपादक नंदन सिंह रावत हैं। मैं निजी रूप से रावत जी और सेमवाल जी को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होंने मुझे इस योग्य समझा कि कार्यक्रम में निमंत्रित किया औऱ ऐसे महान तपस्वियों के सान्निध्य का सुख और पुण्य कमाने का अवसर प्रदान किया।

Thursday, March 19, 2015

गढ़वाल भवन मामले में एसएचओ के लाइनहाज़िर होने की बात सच या झूठ?

Uttarakhand News - गत रविवार मैं दिल्ली में पंचकुंइयां रोड पर स्थित गढ़वाल भवन गया, तो सबसे पहले गेट पर लगे इस नोटिस पर मेरी नज़र पड़ी। सेल पर लगी सील से गढ़वाल भवन से जुड़े लोग ही नहीं समस्त उत्तराखंडी समाज के लोगों को इस मामले में न्याय मिलने की उम्मीद और बढ़ गई है।
गढ़वाल भवन और उसके गेट पर लगा नोटिस।
आज सारा दिन उत्तराखंडी समाज में इस बात की चर्चा हो रही थी कि गढ़वाल भवन मामले में मंदिर मार्ग थाने के एसएचओ को लाइन हाज़िर कर दिया गया है। बहुत से लोगों ने तो फेसबुक पर गढ़वाल भवन के पदाधिकारियों को बधाई भी दे दी। यह सच है या कोरी अफवाह, यह बात तो भविष्य के गर्भ में छिपी हुई है। पर कुछ भी हो मामला काफी दिलचस्प नज़र आ रहा है।

गढ़वाल भवन वैसे भी अकसर चर्चा का विषय बना रहता है। इन निरर्थक चर्चाओं का केंद्र रहती है गढ़वाल भवन का संचालन करने वाली कमेटी के चुनाव में शिरकत करने वाले गुटों के बीच की राजनीति। ऐसा माना जाता है कि यहां चुनाव लड़ने वाले बहुत से लोग उत्तराखंड या दिल्ली की राजनीति में अपना भविष्य देख रहे होते हैं। अब सच कुछ भी हो, पर इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि गढ़वाल भवन में लगने वाली इकोनॉमी सेल को फिलहाल तो एनडीएमसी ने सील कर दिया है। सेल पर लगी सील में गढ़वाल भवन के पदाधिकारियों का कितना हाथ है, यह तो वे खुद ही जानते होंगे।

Tuesday, March 17, 2015

मां चंद्रवदनी मंदिर को बद्री-केदार की तरह धाम के रूप में मान्यता दिलाने की मुहिम

Uttarakhand News - गैर-सरकारी संगठन भयात के तत्वावधान में मार्च 15 को सुबह 11 बजे दिल्ली के पंचकुइयां मार्ग स्थित गढ़वाल भवन में एक बैठक का आयोजन किया, जिसमें - देव संस्कृति बचाओ - अभियान के तहत दिल्ली की उत्तराखंड मूल की जनता का आह्वान किया गया कि वह चैत्र नवरात्र (मार्च 20 से 28, 2015) के दौरान टिहरी गढ़वाल में लगने वाले नौ दिवसीय नवरात्र आयोजन में भारी संख्या में भागीदारी करे।
बैठक की अध्यक्षता सुप्रसिद्ध समाजसेवी डॉ विनोद बछेती ने की और उन्होंने अपने संबोधन में उत्तराखंड के लिए पर्यटन उद्योग के महत्व पर प्रकाश डाला। अनिल कुमार पंत ने सुझाव दिया कि देव संस्कृति बचाओ अभियान के तहत उत्तराखंड के पौराणिक महत्व वाले सभी उपेक्षित धर्म स्थलों के बारे में जानकारी का प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए, ताकि उन सभी का विकास सुनिश्चित किया जा सके।


क्या किसी क्षेत्र-विशेष के लोग अपने प्रयासों से अपने इलाके में स्थित किसी मंदिर को इतना प्रसिद्ध करवा सकते हैं कि पूरी दुनिया में उसे बद्रीनाथ, केदारनाथ या यमनोत्री-गंगोत्री जैसी मान्यता मिल जाए? इस विषय पर बैठक में मौजूद लोगों में एकमत नहीं था। पर दिलचस्प बात यह रही कि सभी लोग मां चंद्रवदनी धाम के प्रचार-प्रसार को लेकर पूरी तरह गंभीर थे और तन-मन-धन से काम करने को पूरी तरह तत्पर थे।

रोशनी चमोली ने बैठक में जानकारी दी कि मां चंद्रवदनी की पहली यात्रा दिल्ली से मार्च 26 को टिहरी गढ़वाल के लिए रवाना होगी। बैठक में अनेक लोगों ने मां चंद्रवदनी के मंदिर स्थल को धाम के रूप में मान्यता दिलाने के मंत्री प्रसाद नैथानी के प्रयासों की भी प्रशंसा की।

इस अवसर पर रोशनी चमोली, सूरज रावत, भरत रावत, अनिल कुमार पंत, देव सिंह रावत, सतेंद्र रावत, बी.एस. रावत, दर्शन सिंह रावत, किरन केंथोला, मनोज जुगरान और जगजीत बिष्ट आदि ने भी विचार व्यक्त किए। 

Monday, March 16, 2015

मां चंद्रबदनी की पहली यात्रा दिल्ली से मार्च 26 को करेगी प्रस्थान

Uttarakhand News - भरत रावत ने यह विज्ञप्ति भेजी है -

मित्रों मुझे यह बताते हुए बहुत ही हर्ष हो रहा है कि कल गढ़वाल भवन में "देव संस्कृति बचाओ अभियान" के तहत माँ चन्द्रबदनी सिद्धपीठ को धाम बनाने हेतु की गयी बैठक सफल रही है और आप सभी मित्रों के प्रयास से पहली यात्रा इन नवरात्रों में 26 मार्च को दिल्ली से बसों द्वारा निकाली जा रही है जिसके लिये 175 से अधिक माता के भक्तों ने जाने का संकल्प लिया है...; यह यात्रा दिल्ली 26 मार्च को दिल्ली से "माँ चन्द्रबदनी" धाम एवं "नीलकंठ महादेव" होते हुए 28 मार्च को दिल्ली वापसी होगी, जिसके लिये नाममात्र का शुल्क 1000/- प्रति व्यक्ति लिया जा रहा है, जिसमें आने जाने का किराया, खाने एवं ठहरने की व्यवस्था शामिल हैयदि आप भी इस यात्रा से जुड़ना चाहते हैं तो संपर्क करें -
09811526475 / 09999338404 09350535391 / 011-42765391
---- भरत रावत 

Tuesday, March 3, 2015

उत्तराखंड की जर्जर सड़कों और खस्ताहाल बसों से यात्रियों की जान खतरे में

Uttarakhand News - उत्तराखंड के मुख्यमंत्री (Uttarakhand Chief Minister) हरीश रावत ने कहा है कि राज्य के उद्योगों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए यह बेहद ज़रूरी है कि श्रमिक और सेवायोजकों के बीच सौहार्द्रपूर्ण संबंध हों। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और श्रममंत्री ने प्रेस विज्ञप्तियां जारी करके राज्य में विभिन्न उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों की सुरक्षा के प्रति अपनी जिम्मेदारी पूरी कर ली है।। लेकिन यही लोग उत्तराखंड की जर्जर सड़कों में खस्ताहाल सरकारी वाहनों में यात्रा करने वाले यात्रियों की सुरक्षा के प्रति सजग क्यों नहीं हैं, यह मेरे लिए हैरानी का विषय है। कितने ही उत्तराखंडी युवक, महिलाएं, बच्चे और वृद्ध हर साल इन खूनी सड़कों और वाहनों की भेंट चढ़ जाते हैं। पर शासन और प्रशासन हैं कि उनकी नींद टूटती ही नहीं।
उत्तराखंड सरकार के सूचना एवं लोकसंपर्क विभाग द्वारा जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार हरीश रावत ने श्रमिकों की सुरक्षा के प्रति ये विचार "राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस" के अवसर पर प्रकट किए। उन्होंने सभी संबंधित पक्षों का आह्वान किय है कि सभी उद्यमी और श्रमिक यह सुनिश्चित करें कि उनमें परस्पर सहभागिता और सहयोग का वातावरण पनपे और उनमें मधुर संबंध स्थापित हों। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सभी संबंधित पक्षों को उद्योगों में श्रमिकों की सुरक्षा के बारे में अत्यधिक सजग रहना चाहिए।

इससे पहले उत्तराखंड के श्रम मंत्री हरीश चंद्र दुर्गापाल ने यह घोषणा की थी कि भारत के अन्य प्रांतों की तरह ही उत्तराखंड में भी 4 मार्च के दिन को "राष्ट्रीय सुरक्षा दिवस" के रूप में मनाया जाएगा। साथ ही 4 मार्च से ही "राष्ट्रीय सुरक्षा सप्ताह" का आयोजन भी किया जाएगा।

ऐसे आयोजनों का स्वागत किया जाना चाहिए। उत्तराखंड के उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा बहुत ज़रूरी है और यदि उत्तराखंड सरकार इसके लिए सजग दिखाई देती है, तो यह एक उत्तम लक्षण ही है। परंतु हैरानी औऱ उससे भी ज्यादा यह दुख की बात यह है कि यही उत्तराखंड सरकार राज्य में हर साल सैकड़ों लोगों के सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाने के बावजूद कोई सशक्त सड़क परिवहन नीति लाने में सर्वथा विफल ही रही है। खासतौर से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सड़कों और सरकारी परिवहन निगम की बसों की हालत जर्जर है। हरीश रावत सरकार को इनकी सुध भी लेनी चाहिए।

Wednesday, February 18, 2015

गढ़वाल भवन का प्रथम तल सील

Uttarakhand News - सबसे पहले अनिल कुमार पंत जी ने मुझे सूचित किया था कि दिल्ली में पंचकुइंया मार्ग पर स्थित गढ़वाल भवन की पहली मंजिल को NDMC ने सील कर दिया है। आमतौर पर चुपचाप अपना काम करने वाले धीर-गंभीर पंत जी उस दिन काफी उत्साहित थे। यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि वे उन कुछ गिने-चुने लोगों में से एक हैं, जो निस्वार्थ भाव से गढ़वाल हितैषिणी सभा के काम में जुटे रहते हैं और लाइम-लाइट से दूर रहते हैं। उन्होंने हिमालयन न्यूज एक का लिंक भी भेजा था और कहा था कि मैं इस न्यूज को ज़रूर लगाऊं, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक यह समाचार पहुंच सके। व्यस्तता के चलते मैं उस दिन इसे नहीं लगा सका, इसलिए, देर से ही सही, पर आज लगा रहा हूं।
हिमालयन न्यूज में प्रकाशित समाचार - “दिल्ली के गढ़वाल भवन की पहली मंजिल को NDMC ने सील कर दिया है। 2008 से इस मंजिल पर किरायदार के जरिये किराया नहीं दिए जाने की वजह से NDMC ने इसे सील किया है। इस फैसले का गढ़वाल भवन से जुड़े लोगों ने स्वागत किया है। किरायदार पर इस मंजिल पर अवैध तरीके से कब्जा करने का आरोप है। कब्जे को लेकर उत्तराखंड समाज और किरायदार के बीच काफी लम्बे समय से विवाद चल रहा था। जिसमें दिल्ली के सभी सामाजिक संगठनों ने उत्तराखंड समाज को अपना समर्थन दिया। NDMC के इस फैसले के बाद सामाजिक संगठनों ने खुशी जताई है।”
Anil Kumar Pant
वैसे यहां मैं यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि अभी हम यह नहीं कह सकते कि NDMC के इस कदम से मामला खत्म हो गया है और किराएदार ने जगह छोड़ दी है, पर जो लोग गढ़वाल भवन की तरफ से किराएदार के खिलाफ लंबी कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे, उनके हाथ एक बड़ी सफलता तो लगी ही है।

Monday, February 16, 2015

उत्तराखंड न्यूज डॉट ओआरजी परिवार में देखते-ही-देखते हो गए 1000 सदस्य

Uttarakhand News - कल सुबह शोभा नेगी जी ने जैसे ही uttarakhandnews.org का फेसबुक पेज लाइक किया, तो दो महीने से भी कम पुराने इस पेज (facebook.com/uttarakhandnews.org) पर 1000 लाइक्स अंकित हो गए। हम उत्तराखंड के सभी शुभचिंतकों का धन्यवाद करना चाहते हैं, जिन्होंने हमारी इस छोटी-सी शुरुआत का फेसबुक पर लाइक का बटन दबाकर समर्थन किया है। 
शोभा नेगी व उनके परिवार का चित्र।
दिसंबर के अंतिम सप्ताह में जब हमने इस पेज को लाइव किया था, तो हमने सोचा था कि इस पेज को जो पहले सौ लोग लाइक करेंगे, उनके फोटो प्रकाशित करके हम उनका धन्यवाद करेंगे, पर लाइक्स इतनी तेजी से बढ़े कि पता ही नहीं चला कि कब 1000 की संख्या भी पार हो गई। पर  किसी अन्य अवसर पर उन सभी 100 लोगों के फोटो भी हम जरूर प्रकाशित करेंगे, उनका धन्यवाद करने के लिए।

आप सभी उत्तराखंडी भाई-बहनों को हम यह विश्वास भी दिलाना चाहते हैं कि आपने जो भरोसा हम पर दिखाया है उसे हम कभी टूटने नहीं देंगे।uttarakhandnews.org में सिर्फ औ सिर्फ उत्तराखंड और उत्तराखंडियों के हित की बात ही की जाएगी। uttarakhandnews.org आपकी अपनी संपत्ति है, जैसा आप सभी चाहेंगे, इसमें वही कुछ लिखा और पढ़ा जाएगा। हम एक बार फिर आप सभी का हाथ जोड़कर धन्यवाद करते हैं।

साभार,
uttarakhandnews.org 

Sunday, February 15, 2015

उत्तराखंड सरकार का हाथ औद्योगिक घरानों के साथ

Uttarakhand News - उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने गुरुवार को 'वाइब्रेंट उत्तराखंड ट्रेड-फेयर 2015' नामक कार्यक्रम का देहरादून स्थित परेड ग्राउंड पर गुरुवार के दिन विधिवत रूप से शुभारंभ किया। कार्यक्रम का आयोजन इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड इवेंट अॉर्गेनाइजेशन (आईआईटीइओ) व इंडस्ट्रीज एसोसिएशन अॉफ उत्तराखंड (आईएयू) के तत्वावधान में किया गया। 

मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रमों से उत्तराखंड में निवेश का अनुकूल माहौल बनता है और अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है। उन्होंने आगे कहा कि प्रदेश सरकार देशी व विदेशी निवेश को राज्य में लाने के लिए अनुकूल वातावरण बनाने के लिए प्रतिबद्ध है और इसके अनुकूल नीतियां बनाई जा रही हैं। उन्होंने एम.एस.एम.ई नीति का जिक्र भी किया।

इस अवसर पर हरीश रावत ने देशी-विदेशी औद्योगिक घरानों का आह्वान किया कि वे उत्तराखंड में उद्योगों की स्थापना करें, इसमें राज्य सरकार उनका भरपूर सहयोग करेगी।

आईआईटीइओ के चेयरमैन बी.एस. नेगी ने भी इस मौके पर विचार व्यक्त किए। विधायक राजकुमार, आईएयू अध्यक्ष पंकज गुप्ता व सचिव अनिल गोयल, आईआईटीइओ की सचिव अमीता रॉय और सम्राट कुमार आदि इस अवसर पर मौजूद थे।

Thursday, February 12, 2015

आप की जीत से उत्तराखंडियों को मिली - निराशा, हताशा और अनिश्चितता

Uttarakhand News - उत्तराखंड मूल के 36 लाख लोगों को आम आदमी पार्टी की 'भयावह' चुनावी जीत से कोई फायदा नहीं हुआ है। अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के करीब 18-19 लाख उत्तराखंडी मतदाताओं में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जो उनकी तथाकथित ईमानदार पार्टी के बैनर तले चुनावी संग्राम में हिस्सा ले पाता। स्पष्ट है उन्होंने उत्तराखंडियों की सिरे से उपेक्षा कर दी। क्या उत्तराखंड के लोग आम आदमी नहीं हैंं?

जब अन्ना का आंदोलन अपने उफान पर था, तो हजारों उत्तराखंडी लोग उनके साथ दृढ़ता से खड़े थे। बाद में अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी का गठन किया, तो उत्तराखंडियों ने उनके फैसले का समर्थन किया और पार्टी के प्रचार-प्रसार मेें पूरा सहयोग किया। आम आदमी पार्टी की नीतियों का भरपूर प्रचार-प्रसार किया और उसकी ईमानदार होने की छवि को मजबूत किया। उत्तराखंडियों को उम्मीद थी कि कम से कम अरविंद केजरीवाल वे गलतियां तो नहीं दोहराएंगे, जो गलतियां सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस और भाजपा ने उत्तराखंडियों को जनसंख्या के अनुसार टिकट न देकर की थी। दुख की बात है कि यह उम्मीद एक मृग-मरीचिका ही निकली। अरविंद केजरीवाल ने उत्तराखंडी समुदाय के लोगों को उनकी जनसंख्या से हिसाब से प्रतिनिधित्व ने देकर कैसी ईमानदारी का परिचय दिया है। क्या केजरीवाल की नजर में उत्तराखंड के लोग आम आदमी नहीं हैं?

यदि अरविंद केजरीवाल उत्तराखंड के सुविधाविहीन गांवों का दौरा करें, तो उन्हें पता चलेगा कि असल में आम आदमी होना क्या होता है। वहां छोटे-छोटे बच्चे स्कूल पढ़ने के लिए घनघोर जंगलों से गुजरकर विद्यालय की कच्ची इमारतों में जाते हैं। वहां की महिलाएं पशुओं के लिए चारा लेने एेसे घनों वनों में जाती हैं, जो बाघ, भालुओं, कोबरा और हाथियों से भरे पड़े हैं। वहां के युवक दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में जाकर छोटे-मोटे काम करने के लिए मजबूर हैं, क्योकि वहां उनकी कोई जान-पहचान नहीं होती। ये पर्वतीय समाज के लोग बिना किसी के आगे हाथ फैलाए, बिना किसी की चमचागिरी किए और बिना किसी को चोर बताए, केवल अपने पुरुषार्थ के बल पर दिल्ली में अपना कुछ मुकाम बनाने में जुटे हुए हैं। यदि हमारे कुछ लोग चुनाव लड़कर क्षेत्र में अपना और अपने समाज का कुछ नाम करना चाहते हैं, तो इसमें गलत क्या है?

कुछ प्रश्न हैं जो आज के परिप्रेक्ष्य में मेरे दिमाग में आते हैं - 

* आखिर क्यों सभी राजनीतिक दल हमारे वोट तो चाहते हैं, पर हमें टिकट नहीं देना चाहते?

* आखिर कौन हैं वो लोग जो हमारे शहीदों का भी अपमान करने पर उतर आए हैं?

* आखिर कौन हैं हमारे वो उत्तराखंडी भाई जो भविष्य में टिकट मिलने की आस में आज अपने ही भाइयों का मजाक उड़ाने पर उतर आए हैं?

कुल मिलाकर यदि मैं यह कहूं कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनावों में विजय ऐतिहासिक तो है, पर उसके बाद आप से जुड़े लोगों ने जो कुछ किया है, उससे उत्तराखंडियों को कुछ नहीं मिला, बल्कि उनमें निराशा, हताशा और अनिश्चितता की भावना का ही प्रसार हुआ है, तो यह गलत न होगा। 

Saturday, February 7, 2015

If you accept climate disruption, then there will be development disruption: DSDS 2015

Uttarakhand News - Heads of State, Nobel Laureates and thought leaders converged at the landmark 15th Delhi Sustainable Development Summit 2015 (DSDS) to find solutions for some of the key issues that will shape our global planet. This flagship event of The Energy and Resources Institute (TERI) provided a unique platform to further the developmental discourse on ‘Sustainable Development Goals and Dealing with Climate Change’, the theme this year. The DSDS 2015 assumes significance as the post-2015 development agenda is being finalized -- the United Nations General Assembly (UNGA) is expected to adopt the new set of goals in September 2015 and the climate negotiations (Conference of Parties – CoP21) will be held Paris later this year.

Dr R K Pachauri, Director-General, TERI, said: “The IPCC reports have proved beyond doubt that if we don’t take immediate measures, the future will be catastrophic. But climate change also offers an opportunity of co-benefits – investing in clean and affordable energy sources like solar and wind power can curb greenhouse gas emissions, and clean transportation systems such as trains and cycling can reduce air pollution woes and improve public health. DSDS is a reaffirmation of the support that TERI receives from across the globe.” Said Mr Prakash Javadekar, Hon’ble Minister of State for Environment, Forest & Climate Change, India“Growth has brought in a scenario where inequities are growing. This has to be taken up in the development discourse. Prime Minister Narendra Modi has said that we are suffering due to the pressures created by climate change. We have the responsibility to improve the lives of the future generations. We have already taken the clean energy path – we have enhanced our renewable energy commitments and launched smart cities.”

“All countries have been affected by air pollution. Clean air must be a birthright for all. We need to work towards clean air, water and energy for all,” Mr Javadekar added.

Said Mr Suresh Prabhu, Hon’ble Minister for Railways, India: “Climate change is a scientific reality. If we delay action, the repercussions will be disastrous. We need to find a unified solution to tackle climate change innovatively. We need to move towards a low carbon economy and this has the potential to create new employment opportunities.”

Delivering the special address, Mr Arnold Schwarzenegger, Founding Chair, R20 – Regions of Climate Change, & Former Governor, California, said: “Climate change is no science fiction. We need both a bottom up and a top down approaches. India will be a major player in the climate negotiations. We need action, not hesitation.”

“We need to find innovative solutions to problems such as indoor air pollution. TERI’s Lighting a Billion Lives campaign has illustrated new solutions, providing solar lanterns as a clean alternative to the polluting kerosene lamps,” added Mr Schwarzenegger.

Delivering the inaugural address, HE Mr Laurent Fabius, Minister of Foreign Affairs and International Development, France, & Former Prime Minister, France, & President, COP 21, said: “2015 will be a decisive milestone for climate change and sustainable development. The scientific community has done its job. Now governments and the corporate sector must play its part. If you accept climate disruption, then there will be a development disruption.”

Said Dr Annapurna Vancheswaran, Director, Sustainable Development Outreach Division, TERI: “DSDS is the foremost forum to deliberate on critical environmental and developmental problems. Having been part of every edition of the DSDS, I can say the journey has been fascinating.”

At a special session ‘Leaders’ Speak’, Nobel Laureate Prof. Yuan Tseh Lee, President Emeritus and Distinguished Research Fellow, Academia Sinica, said“Climate change is the biggest enemy of the planet. It cannot be solved by the scientific community, but by everybody. To be successful, we have to be organized and work together. Population explosion and consumption explosion has overloaded the Earth with many dangers. We need to wake up to this crisis.”

Said Nobel Laureate Mr Kailash Satyarthi, Founder of Bachpan Bachao Andolan & Chairperson, Global March Against Child Labour, India: “A large number of girls have been abducted and taken hostage by the ISIS. Parents said that they sent their girls in uniform, but they returned in coffins. We live in a world where children are sold as animals, sometimes even less than animals. The biggest crime is denying the child a chance to dream.”

Among the highlights of the day was the release of TERI publications – Global Sustainability Report and an Energy Security Atlas.

About DSDS

The Energy and Resources Institute (TERI), since 2001, annually organizes the DSDS, an international platform to facilitate the exchange of knowledge on all aspects of sustainable development. Over the past 14 years, it has emerged as one of the foremost institutions on issues of global sustainability. The flagship event of TERI brings together various Heads of State and Government, thought leaders, policymakers, and the crème de la crème of industry and academia to deliberate on myriad issues. Till date, the Summit has hosted over 36 Heads of State, ministers from over 50 countries and delegates from across continents. The Summit has evolved as a significant congregation of leaders from the fields of polity, economy, academia and civil society to deliberate on issues related to sustainable development. For more information, please click: http://dsds.teriin.org/2015/

About TERI

The Energy and Resources Institute (TERI) is an independent, not-for-profit research organization deeply committed to every aspect of energy, environment, and sustainable development. From providing environment-friendly solutions to rural energy problems, to helping shape the development of the Indian oil and gas sector; from tackling global climate change issues across many continents to enhancing forest conservation efforts among local communities; from advancing solutions to growing urban transportation and air pollution problems to promoting energy efficiency in Indian industries, the emphasis has always been on finding innovative solutions to make the world a better place to live in. All activities at TERI move from formulating local and national–level strategies to suggesting global solutions tackling critical energy and environment related issues.

Headed by Dr R K Pachauri, also the chairperson of the Nobel Peace Prize winning climate change body, the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC), TERI has emerged as an institution of excellence for its path-breaking research, and is a global brand widely respected by political leaders, policymakers, corporate entities as well as the civil society at large.

Thursday, February 5, 2015

Uttarakhand News - Five (5) Important News from Uttarakhand

Uttarakhand News - The people of Uttarakhand continued to feel chillness in the weather because of snowfall in the higher reaches and rain in the plains.

In my opinion, following are the five (5) most important news of this week:

1. Kedarnath, Badrinath, Gangotri and Yamnotri regions got covered under thick layers of snow. India's winter game destination Auli and high altitude areas of Pithauragarh also received fresh snowfall.

2. In spite of the heavy snowfall and rain, no highways of Uttarakhand got obstructed. It's actually very unusual, otherwise moderate rain is enough to block roads in the state, especially, in the capital Dehradun. The number of tourists visiting Uttarakhand reduced as compared to the last year data.

3. The Uttarakhand Spring Bird Festival begins at Chunakhan February 4. The five-day bird festival is organized with the objective to make Uttarakhand hottest bird watching destination.

4. The Uttarakhand government has asked central government for more budgetary allocations for repairing school buildings in Uttarakhand.

5. The Chief Minister of Uttarakhand Harish Rawat requests migrated Uttarakhandi industrialists to establish industries in Uttarakhand to improve employment opportunities in the state.

Wednesday, February 4, 2015

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने प्रवासियों से कहा - घर लौट आओ प्लीज

Uttarakhand News - उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 1 फरवरी के दिन मुंबई में निर्माणाधीन बद्रीनाथ मंदिर का शिलान्यास किया। करीब 11 करोड़ रुपये की लागत से बन रहे इस मंदिर का निर्माण उत्तराखंड मित्र मंडल नाम की संस्था कर रही है। पिछले कुछ सालों में उत्तराखंडी प्रवासियों ने जिस तरह से शानदार तरक्की की है, उसकी रावत ने तारीफ की और उनसे अनुरोध किया कि अब वे राज्य के विकास में योगदान दें।

यह वास्तव में गर्व की बात है कि उत्तराखंड के लोग जहां-जहां भी जाते हैं, वहां अपनी सभ्यता, संस्कृति और संस्कार साथ ले जाते हैं। लेकिन उत्तराखंड से हो रहे भारी पलायन व उसके नुकसान से भली-भांति परिचित रावत ने इस अवसर पर प्रवासी उत्तराखंडियों का आह्वान किया कि वे उत्तराखंड वापस लौट आएं। उन्होंने विशेष रूप से प्रवासी उत्तराखंडी निवेशकों से आग्रह किया कि वे अपनी जन्मभूमि के विकास में सहयोग करें और उत्तराखंड में उद्योग-धंघे लगाएं,  जिससे राज्य में रोजगार के अवसर पैदा हों और वर्तमान पीढ़ी के हो रहे भारी पलायन में कुछ कमी लाई जा सके।

मेरा गांव मेरा धन योजना के बारे में बताते हुए मुख्यमंत्री ने प्रवासी व्यावसायियों से कहा कि वे इस योजना में निवेश करके उत्तराखंड में शिक्षा व स्वास्थ्य के क्षेत्र में मददगार बन सकते हैं। बताया गया कि इस योजना के तहत विद्यालय, चिकित्सालय, आंगनबाड़ी और आईटीआई के भवनों का निर्माण किया जाता है और राज्य सरकार निवेश की गई धनराशि पर सामान्य एफडी से 2 प्रतिशत अधिक ब्याज देगी।

मुख्यमंत्री ने यह भी बताया कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में छोटे व लघु उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए विशेष नीति बनाई गई है। वहां उद्योग लगाने वाले उद्योगपतियों को विशेष सहूलियते दी जाएंगी। उन्होंने आह्वान किया कि प्रवासी उद्योगपति इस नीति का लाभ उठाएं और उद्योग लगाकर उत्तराखंड के विकास में सहयोग करें। 

मुख्यमंत्री ने मंडल को भी आश्वासन दिया कि बद्रीनाथ मंदिर के निर्माण में उत्तराखंड सरकार हरसंभव सहायता करेगी। उन्होंने कहा कि मुंबई में भगवान बद्रीनाथ के प्रतीक की पूजा उत्तराखंड के चार धामों की यात्रा पर आने वाले तीर्थयात्रियों के लिए प्रेरणा का काम करेगी। संस्था के अनुसार मंदिर के साथ ही 3 कम्यूनिटी हाल और 100 कमरों का निर्माण भी किया जाएगा, जिनमें उत्तराखंड से पढ़ाई के लिए मुंबई आने वाले विद्यार्थियों और इलजा के लिए आने वाले मरीजों के निशुल्क ठहरने की व्यवस्था की जाएगी।

शिलान्यास के अवसर पर उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, उद्योगपति मोहन काला, हीरा सिंह भाकुनी और महामंडलेश्वर विश्वेश्वरा नंद समेत कई संत-महात्मा व मुंबई में रहने वाले सैकड़ों उत्तराखंडी मौजूद थे।

उत्तराखंड समाज को चाहिए कि वह हर शहर में, जहां उत्तराखंडियों की जनसंख्या पर्याप्त है, ऐसे स्थलों का निर्माण करे, जो उत्तराखंड से वहां जाने वाले जरूरतमदों के लिए मददगार साबित हो सके। मुंबई की उत्तराखंड मित्र मंडल संस्था वास्तव में प्रशंसा की पात्र है।

Sunday, February 1, 2015

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने की पत्रकारों की सराहना

Uttarakhand News - उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने 30 जनवरी को इंडियन फेडरेशन अॉफ वर्किंग जर्नलिस्ट के देहरादून नगर निगम में आयोजित प्रांतीय अधिवेशन में पत्रकारों के संगठन को पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक और समाज को दिशा देने वाला बताया। कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने पत्रकारों और समाज सेवा से जुड़े लोगों को सम्मानित भी किया।

इस अवसर पर आपदा और पुनर्निर्माण के समय मीडिया की भूमिका विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन भी किया गया। मौजूद लोगों को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि सन 2013 में आई प्राकृतिक आपदा के दौरान सेना, अर्द्धसैनिक बलों, पुलिस के जवानों और स्थानीय लोगों ने आपदा पीड़ितों की जिस तरह से सहायता की थी, वह मानव सेवा का एक बड़ा उदाहरण है। माइनस 7 डिग्री तापमान में भी उत्तराखंड के लोग जिस तरह से पुनर्निर्माण के काम में लगे रहे, वह उनकी समाज के प्रति प्रतिबद्धता और सेवा भाव का जीवंत उदाहरण है।

रावत ने कहा कि उन्हें मीडिया से यही अपेक्षा है कि वह आपदा से ग्रस्त क्षेत्रों के पुनर्निर्माण के सकारात्मक पक्ष को देश व दुनिया के सामने प्रस्तुत करे।

आपदा से ग्रस्त केदारनाथ के पुनर्निर्माण कार्यों में सराहनीय काम करने वाले निम के कर्नल अजय कोठियाल, सीमा सुरक्षा बल के कमांडेंट राजकुमार नेगी, निम के योगेंद्र राणा और पत्रकारिता व समाजसेवा से जुड़े अन्य लोगों को इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने सम्मानित किया।

इस अवसर पर आईएमडब्ल्यू के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव ने संगठन की गतिविधियों की जानकारी दी। मेयर विनोद चमोली के अलावा परमानंद पांडे, सुदर्शन कठैत और मनोज रावत ने भी कार्यक्रम में विचार प्रकट किये।

Thursday, January 29, 2015

उत्तराखंड न्यूज - उत्तराखंड के पांच (5) महत्वपूर्ण समाचार

Uttarakhand News - उत्तराखंड के लोगों के लिए बीता सप्ताह काफी हलचल भरा रहा। राज्य. के ऊंची पहाड़ियों पर हुई भारी बर्फबारी से राज्य में कड़क़ड़ाती ठंड और भी बढ़ गई, लेकिन राजनीतिक मौसम गर्माया रहा। दिल्ली में उत्तराखंड मूल के लोगों ने विधनसभा सीटों पर लड़ने का फैसला करके उत्तराखंडियों को आपसी मेल-जोल बढ़ाने का अच्छा मौका दिया हुआ है। मुंबई में कौथिग का भव्य आयोजन करके उत्तराखंडियों ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उन्होंने उत्तराखंड राज्य की सीमाओं से बहुत आगे का सफर तय कर लिया है।

मेरी नजर में इस सप्ताह की पांच महत्वपूर्ण खबरें निम्न हैं -

1. उत्तराखंड के प्रसिद्ध भू-गर्भ वैज्ञानिक के.एस. बल्दिया (पिथौरागढ़ निवासी) को पद्म भूषण और मुंबइया फिल्मों में गीत लिखने वाले सुप्रसिद्ध एड-गुरु प्रसून जोशी को पद्मश्री सम्मान के लिए चुना गया।

2. राष्ट्रीय रक्षा महाविद्यालय (एडीसी) का 15 सदस्यीय दल ले. जनरल वी. पी. सिंह के नेतृत्व में अगले महीने प्रथम सप्ताह में 1-6 फरवरी उत्तराखंड का दौोरा करेगा।

3.  उत्तराखंडियों ने मुंबई में कौथिग का भव्य आयोजन किया। शायद दुबई कौथिग के बाद कौथिग का यह सबसे शानदार आयोजन है।

4. दिल्ली विधानसभा चुनावों में कांग्रेस व भाजपा ने केवल 1-1 उत्तराखंडी को उम्मीदवार बनाया। जबकि आम आदमी पार्टी ने किसी भी उत्तराखंडी को टिकट नहीं दिया। कांग्रेस ने लीलाधर भट्ट को आर.के. पुरम सीट से उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने करावल नगर विधानसभा सीट से मोहन सिंह बिष्ट को टिकट दिया है। बिष्ट लगातार चार चुनाव जीत चुके हैं। बिष्ट और भट्ट को भारी जनसमर्थन मिल रहा है। उत्तराखंड के अधिकांश लोग पार्टी लाइन के विरुद्ध जाकर भी पहाड़ी उम्मीदवारों का समर्थन कर रहे हैं और उनके लिए चुनाव प्रचार में भी व्यस्त हैं।

5. टिकट बांटने में राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के उपेक्षापूर्ण व्यवहार से उत्तराखंड मूल के दिल्ली निवासियों में भारी रोष व्याप्त हो गया। कई उत्तराखंडियों ने चुनाव लड़ने की घोषणा कर डाली है। शायद उत्तराखंडियों के असंतोष का फायदा उठाने के लिए ही नवगठित समरस समाज पार्टी ने 15-20 उत्तराखंडियों को दिल्ली विधानसभा चुनाव में टिकट देने की घोषणा कर दी।

बिष्ट और भट्ट के अलावा दिल्ली से चुनाव लड़ने वाले कुछ प्रमुख उत्तराखंडियों के नाम इस प्रकार हैं -

1) धर्मपाल कुमाईं, बुरारी
2) बीर सिंह नेगी, कस्तूरबा नगर
3) मोहन प्रकाश, पड़पड़गंज
4) प्रकाश रावत, बदरपुर 

Monday, January 26, 2015

उत्तराखंडियों की जीत होगी मोहन सिंह बिष्ट की जीत

Uttarakhand News - मोहन सिंह बिष्ट (Mohan Singh Bisht) का नाम बहुत सुना था, आज करावल नगर में उनका जलवा देख भी लिया। दिल्ली की राजनीति में वह सही मायनों में उत्तराखंड के शेर हैं। 
Mohan Singh Bisht with BJP leader Brajesh Saurabh
आज जब उनसे मुलाकात हुई, तो वह चुनाव प्रचार में व्यस्त थे। जनसभाओं को संबोधित करने की व्यवस्तता के बीच वह इलाके में हो रहे एक विवाह समारोह में भी पहुंच गए। रास्ते पर चलते-चलते आस-पास के लोगों को उनके नाम से इस तरह से बुला रहे थे, मानों करावल नगर एक विधानसभा चुनाव क्षेत्र न हो, बल्कि एक बड़ा-सा गांव हो, जहां रहने वाले सभी लोग एक-दूसरे को भली-भांति जानते-पहचानते हों। लोग-बाग उन्हें देखकर मार्ग पर ही अपनी समस्याओं की उनसे चर्चा करने लगते थे, जिससे स्पष्ट होता था कि वह बिष्ट जी के साथ कितने सहज हैं।
Mohan Singh Bisht with social worker Nandan Singh Rawat
जब उनसे पूछा कि इस बार उन्हें कितनी टक्कर मिल रही है विरोधी दलों से, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, "विरोधी दल और उम्मीदवार जनता को कितना भी दिग्भ्रमित करने की कोशिश कर लें, पर मेरी दो दशकों की सेवाएं क्षेत्र के लोगों को याद हैं। जीत हमारी ही होगी।" उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था।

उत्तरायणी को दिल्ली में राजकीय अवकाश का दर्जा देने की मांग करने वाले समाज सेवक नंदन सिंह रावत ने कहा, "मोहन दा दिल्ली की राजनीति में उत्तराखंड के सबसे सफल राजनीतिज्ञ हैं। उन्होंने यह सब अपने दम पर हासिल किया है। इस बार भी करावल नगर से जीत उनकी ही होगी।"

आज दिल्ली में एेसी भी अफवाह फैली हुई थी कि उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत के पुत्र कांग्रेस की तरफ से इसी क्षेत्र में चुनाव प्रचार करने पहुंचे हुए थे, हालांकि इस बात की पुष्टि नहीं हो सकी। पर चार बार इलाके में विजयश्री हासिल करने वाले बिष्ट जी की लोकप्रियता को देखते हुए, तो एेसा लगता है कि उनके खिलाफ चाहे कोई भी प्रचार करने आ जाए, परिणाम मोहन सिंह बिष्ट की जीत ही होगा।

Sunday, January 25, 2015

उत्तराखंड एकता मंच के भविष्य पर प्रश्नचिह्न?

Uttarakhand News - मेरे लिखे एक लेख उत्तराखंडियों के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव निरर्थक पर फेसबुक पर कल एक चर्चा-सी छिड़ गई थी। इसका टॉपिक था - विनोद बछेती जी बिन्नी के नामांकन में गए या नहीं। क्या उत्तराखंड एकता मंच दिल्ली से जुड़े लोग किसी उत्तराखंडी उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव प्रचार या किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल हो सकते हैं? इस पर मंच के पदाधिकारियों में गंभीर मतभेद नजर आए। अनेक भाइयों ने तो उत्तराखंड एकता मंच के भविष्य पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया।

अब इस विषय का विश्लेषण हम तीन बिंदुओं पर विचार कर सकते हैं -

1. कोई व्यक्ति कहां जाए और कहां न जाए, यह उसका व्यक्तिगत फैसला होता है।

2. यदि वह एक समूह का सदस्य है और उस समूह विशेष के नियम-कायदे उस पर लागू होते हैं, तो यह उसका निजी नहीं, बल्कि सामूहिक फैसला हो जाता है।

3. अब यदि वही व्यक्ति किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होता है, तो उसे अपने दल के प्रति भी निष्ठावान रहना पड़ता है।

4. अंतिम स्थिति यह है कि अब वह व्यक्ति एक राजनीतिक दल से भी जुड़ा है और अपने सांस्कृतिक और जाति समूह का भी अभिन्न अंग है।

यहां चौथी स्थिति सबसे विकट है। इस स्थिति में फंसे व्यक्ति की टांग-खिंचाई सबसे ज्यादा होती है। युवा भाजपा नेता बछेती जी और एकीकृत नगर निगम के जमाने में भाजपा की तरफ से दिल्ली की निर्माण समिति के चेयरमैन पद को सुशोभित करने वाले ममगाईं जी भी इसी श्रेणी में आते हैं। वे दोनों ही उत्तराखंड एकता मंच के महत्वपूर्ण सदस्य होने के साथ-साथ दिल्ली में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता भी हैं।

सचाई जानने के लिए मैंने डॉ विनोद बछेती, जगदीश ममगाईं, संजय नौडियाल, नंदन सिंह रावत और नई दिल्ली विधानसभा सीट पर अरविंद केजरीवाल के खिलाफ ताल ठोककर बाद में चुनाव न लड़ने वाले भरत रावत से बात की।

नंदन सिंह रावत ने कहा, "हमें उत्तराखंडी उम्मीदवारों का साथ देना चाहिए। करावल नगर से खड़े उत्तराखंडी उम्मीदवार का विरोध खुद उत्तराखंड के लोग ही कर रहे हैं, यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।"

भरत रावत ने कहा, "मैं समरस समाज पार्टी में ज्यादा से ज्यादा उत्तराखंडियों को टिकट दिलवाउंगा, लेकिन ऐसी किसी सीट पर अपनी पार्टी के लिए भी चुनाव प्रचार नहीं करूंगा, जहां पर पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ कोई उत्तराखंडी खड़ा है।"

संजय नौडियाल ने कहा, "हम तो फोन करके और व्यक्तिगत रूप से जाकर अपने लोगों से निवेदन कर रहे हैं कि उत्तराखंडी उम्मीदवार चाहे किसी भी दल से हो, उसे ही जिताएं।"

बछेती जी ने कहा, "वह भाजपा के साथ पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से जुड़े हुए हैं। उत्तराखंड एकता मंच से जुड़ने का अर्थ यह नहीं था कि मैंने भाजपा छोड़ दी। यदि किरन बेदी के नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया में पार्टी मुझे बुलाती है और बिन्नी भी वहां मौजदू रहते हैं, तो मेरा वहां जाना गलत कैसे हो गया।"

जगदीश ममगाईं जी ने कहा, "यदि बछेती एक ऐसे कैंडिडेट (बिन्नी) के साथ मौजूद थे, जो कि एक उत्तराखंडी के खिलाफ चुनाव लड़ रहा है, तो यह एक गलत उदाहरण है। बछेती जी से मेरी बात हुई थी 4-5 दिन पहले और मैंने कहा था कि उतराखंड एकता मंच की एक बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय करते हैं। बैठक तो बुलाई नहीं गई और वह भाजपाई उम्मीदवारों के नामांकन में चले गए, यह उत्तराखंड एकता मंच के उद्द्ेश्यों के खिलाफ है। हम सबको एक ऐसी रणनीति बनानी चाहिए, जो उत्तराखंडियों के हितों के अनुसार हो और हम सबको उसी के हिसाब से चलना चाहिए।"

यहां स्पष्ट है कि मंच के सदस्यों में समन्वय का नितांत अभाव है। उन्होंने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के बाद ऐसी कोई रणनीति ही नहीं बनाई कि यदि राजनीतिक दल उत्तराखंडियों की उपेक्षा करें, तो मंच से जुड़े लोग क्या करेंगे? ऐसे में मंच के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगना लाजिमी है। उत्तराखंड एकता मंच दिल्ली के बैनर तले उत्तराखंड के 150 से अधिक सामाजिक संस्थाओं को एक करना एक ऐतिहासिक कदम था। इस पहल को काल के गाल में समाने से रोकने के लिए प्रबुद्ध और प्रभावशाली उत्तराखंडियों को आगे आना चाहिए, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब मंच इतिहास की बात रह जाएगा।

Saturday, January 24, 2015

उत्तराखंडियों के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव निरर्थक

Uttarakhand News - उत्तराखंड मूल के लोगों के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव कोई अच्छी खबर लेकर नहीं आए। मतदान फरवरी के पहले हफ्ते में होने हैं, पर एक बात तो अभी से तय है कि हम लोगों को अपनी जनसंख्या के अनुसार प्रतिनिधित्व दिल्ली में तो नहीं मिलने वाला है।

उत्तराखंड एकता मंच ने दिल्ली में उत्तराखंडियों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए एक अच्छा कदम उठाया था। कुछ समय के लिए ऐसा लगा भी था कि उत्तराखंडी एकजुट हो गए हैं और इसके दूरगामी प्रभाव होगें, पर आखिर में ऐसा कुछ नहीं हुआ और पहले की तरह ही उत्तराखंड मूल के लोगों की उपेक्षा जारी है।

भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल उत्तराखंड जाकर खुद को उत्तराखंडियों का सबसे बड़ा रहनुमा बताते रहे हैं, पर अब उनकी असलियत खुल कर सामने आ गई है। दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने उत्तराखंडियों को यह जता दिया है कि उनकी नज़र में हम लोगों की कोई राजनीतिक औकात नहीं है। शायद वे आज भी हमें चपरासी, घरों में काम करने वाले, छोटे-मोटे ढाबों के कुक-वेटर और फील्ड ब्वॉय ही समझते हैं। मैं यहां साफ कर देना चाहूंगा कि मेरी दृष्टि में कोई भी काम छोटा-बड़ा नहीं है। लेकिन टिकट का सौदा करने वाले दलालों की नजर नोटों से भरी थैलियों और टिकटार्थियों की बड़ी जेबों पर लगी रहती है। ऐसे दलाल टिकट बांटते समय यह ज़रूर सोचते होंगे कि ये बेचारे उत्तराखंडी कहां से लाएंगे करोड़ों रुपये टिकट खरीदने के लिए।

भाजपा ने तो प्राथमिकता से टिकट उन नेताओं को दिए, जो कांग्रेस या आम आदमी पार्टी छोड़कर उनके कुनबे में शामिल हो गए। क्या यह उन लाखों भाजपाइयों का अपमान नहीं है, जो पार्टी के कार्यक्रमों में दरी बिछाने से लेकर भीड़ जुटाने का काम तब से कर रहे थे, जब भाजपा के पास देश भर में केवल दो सांसद थे? यही वजह है कि इस बार विधानसभा उम्मीदवारों के नाम घोषित होते ही भाजपा कार्यकर्ताओं में रोष फूट पड़ा था। वरिष्ठ भाजपा नेता और दिल्ली नगर निगम के पूर्व चेयरमैन जगदीश ममगाईं ने इस विषय पर कहा, "दलबदलुओं और अवसरवादियों को महत्व देते हुए पूर्वांचल के 35-40 लाख मतदाताओं और उत्तराखंड के 20-22 लाख मतदाताओं को किनारे किया गया है। लोकसभा चुनाव में इन दोनों वर्गों ने बीजेपी का जमकर समर्थन किया था, पर केवल दो पूर्वांचली और एक उत्तराखंडी को टिकट दिया गया है।"

दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने एक और कांग्रेस ने भी केवल एक ही सीट पर उत्तराखंड मूल के व्यक्ति को चुनावी रणक्षेत्र में भेजने का फैसला किया है। मोहन सिंह बिष्ट और लीलाधर भट्ट यदि उत्तराखंड मूल के न भी होते, तो भी उन्हें विधानसभा का उम्मीदवार बनाया जाता लगभग तय था। लेकिन बाकी उत्तराखंडियों का क्या, जो दिल्ली में टिकट की आस लगाए बैठे थे?

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