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Monday, January 19, 2015

गढ़वाली-कुमाऊंनी कवि सम्मेलन ने जगाई सुखद भविष्य की आस

Uttarakhandi poet: Dinesh Dhayani.
Uttarakhand News, New Delhi - उत्तराखंडी सामाजिक संस्थाओं - गढ़वाल अध्ययन केंद्र और हमारी धरोहर - के तत्वावधान में गढ़वाली-कुमाऊंनी कवि सम्मेलन का आयोजन 18 जनवरी को दोपहर 2 बजे इंदिरापुरम (गाजियाबाद) स्थित स्क्वेयर मॉल में किया गया, जिसमें उत्तराखंड के कवियों ने अपनी विचारोत्तेजक और मार्मिक कविताओं के पाठ से वहां मौजूद श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।

इस अवसर पर मौजूद कवियों की लंबी सूची में से प्रमुख नाम इस प्रकार हैं - ललित केशवन, पूरन चंद कांडपाल, रमेश घिल्डियाल, जयपाल सिंह रावत चिप्पवड्डु दा, दिनेश ध्यानी, पृथ्वी सिंह केदारखंडी, कुंज बिहारी मुंडेपी, श्रीराम लिंग्वाल, उदयराम ममगाईं राठी आदि। इन कवियों और कवि सम्मेलन के आयोजकों की जितनी तारीफ की जाए, वह कम है। उन्होंने दरअस्ल उत्तराखंडियों को उनके साहित्य से जोड़ने की प्रशंसनीय कोशिश की है। किसी भी समाज के विकास के लिए यह जरूरी है कि ऐसे आयोजन होते रहें, पर उत्तराखंडी साहित्य से जुड़े कार्यक्रम नहीं के बराबर ही होते है। साहित्य का विकास केवल सरकारी मदद से नहीं होता, इसमें साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों और आम जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए।

जैसा कि मैंने परसों भी लिखा था कि हम उत्तराखंडी लोग सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करने में पीछे नहीं रहते। जहां भी उत्तराखंड समाज के लोग रहते हैं, वे मिल-जुलकर एक संस्था बना लेते हैं, फिर रामलीला और उत्तराखंडी सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करके अपनी संस्कृति को जीवित रखने की कोशिश करते हैं। दिल्ली, फरीदाबाद, लखनऊ, चंडीगढ़ समेत उत्तर भारत के कई शहरों में मौजूद गढ़वाल भवन और कुर्माचल भवन हम उत्तराखंडियों के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के मजबूत स्तंभ हैं। हमारे पूर्वजों ने इन भवनों की स्थापना बड़े ही गर्व और आशाओं के साथ की थी। ये दुर्भाग्य की बात है कि अब ऐसे अधिकांश भवन उत्तराखंडी सभ्यता और संस्कृति के मंदिर से अधिक स्वार्थ पर आधारित राजनीति के अखाड़ों में बदल गए हैं।

ऐसा नहीं है कि गढ़वाल भवन और कुर्माचल भवन के चुनावों में भाग लेने वाले सिर्फ स्वार्थी राजनीतिक लोग ही होते हैं, उनमें कई निस्वार्थ समाज सेवक भी शामिल हैं, जिनका एकमात्र उद्द्ेश्य उत्तराखंड की सेवा करना होता है। ऐसे लोगों से मेरा निवेदन है कि अपने गढ़वाल भवनों और कुर्माचल भवनों के विशाल संसाधनों का प्रयोग उत्तराखंड के साहित्य के प्रचार-प्रसार के लिए भी करें। साहित्य समाज का दर्पण होता है, लेकिन आज उत्तराखंड के पास कोई दर्पण नहीं है।

दुख की बात है कि आज उत्तराखंड के साहित्य में कुछ विशेष नया नहीं हो रहा है। दूर जाने की जरूरत नहीं है आप अपने बच्चों से पूछ लो कि उत्तराखंड के साहित्यकारों के नाम बताएं, तो वे सिर खुजाने लगेंगे।

ऐसे निराशा भरे माहौल में गढ़वाली-कुमाऊंनी कवि सम्मेलन का आयोजन करने के लिए गढ़वाल अध्ययन केंद्र, हमारी धरोहर और उनसे जुड़े बुद्धिजीवी प्रशंसा के पात्र हैं। उन्हें इस आयोजन का दायरा बढ़ाकर इसे राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर फैलाना चाहिए। इस कवि सम्मेलन के आयोजन ने सुखद-सी लगने वाली एक आस उत्तराखंडी जनमानस में जगाई है कि उत्तराखंड का साहित्य अब सुरक्षित हाथों में है।

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गढ़वाली-कुमाऊंनी कवि सम्मेलन गाजियाबाद में 18 जनवरी को

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