Sitemap

Sunday, January 25, 2015

उत्तराखंड एकता मंच के भविष्य पर प्रश्नचिह्न?

Uttarakhand News - मेरे लिखे एक लेख उत्तराखंडियों के लिए दिल्ली विधानसभा चुनाव निरर्थक पर फेसबुक पर कल एक चर्चा-सी छिड़ गई थी। इसका टॉपिक था - विनोद बछेती जी बिन्नी के नामांकन में गए या नहीं। क्या उत्तराखंड एकता मंच दिल्ली से जुड़े लोग किसी उत्तराखंडी उम्मीदवार के खिलाफ चुनाव प्रचार या किसी भी तरह की राजनीतिक गतिविधि में शामिल हो सकते हैं? इस पर मंच के पदाधिकारियों में गंभीर मतभेद नजर आए। अनेक भाइयों ने तो उत्तराखंड एकता मंच के भविष्य पर ही प्रश्न चिह्न लगा दिया।

अब इस विषय का विश्लेषण हम तीन बिंदुओं पर विचार कर सकते हैं -

1. कोई व्यक्ति कहां जाए और कहां न जाए, यह उसका व्यक्तिगत फैसला होता है।

2. यदि वह एक समूह का सदस्य है और उस समूह विशेष के नियम-कायदे उस पर लागू होते हैं, तो यह उसका निजी नहीं, बल्कि सामूहिक फैसला हो जाता है।

3. अब यदि वही व्यक्ति किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होता है, तो उसे अपने दल के प्रति भी निष्ठावान रहना पड़ता है।

4. अंतिम स्थिति यह है कि अब वह व्यक्ति एक राजनीतिक दल से भी जुड़ा है और अपने सांस्कृतिक और जाति समूह का भी अभिन्न अंग है।

यहां चौथी स्थिति सबसे विकट है। इस स्थिति में फंसे व्यक्ति की टांग-खिंचाई सबसे ज्यादा होती है। युवा भाजपा नेता बछेती जी और एकीकृत नगर निगम के जमाने में भाजपा की तरफ से दिल्ली की निर्माण समिति के चेयरमैन पद को सुशोभित करने वाले ममगाईं जी भी इसी श्रेणी में आते हैं। वे दोनों ही उत्तराखंड एकता मंच के महत्वपूर्ण सदस्य होने के साथ-साथ दिल्ली में भाजपा के एक वरिष्ठ नेता भी हैं।

सचाई जानने के लिए मैंने डॉ विनोद बछेती, जगदीश ममगाईं, संजय नौडियाल, नंदन सिंह रावत और नई दिल्ली विधानसभा सीट पर अरविंद केजरीवाल के खिलाफ ताल ठोककर बाद में चुनाव न लड़ने वाले भरत रावत से बात की।

नंदन सिंह रावत ने कहा, "हमें उत्तराखंडी उम्मीदवारों का साथ देना चाहिए। करावल नगर से खड़े उत्तराखंडी उम्मीदवार का विरोध खुद उत्तराखंड के लोग ही कर रहे हैं, यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।"

भरत रावत ने कहा, "मैं समरस समाज पार्टी में ज्यादा से ज्यादा उत्तराखंडियों को टिकट दिलवाउंगा, लेकिन ऐसी किसी सीट पर अपनी पार्टी के लिए भी चुनाव प्रचार नहीं करूंगा, जहां पर पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ कोई उत्तराखंडी खड़ा है।"

संजय नौडियाल ने कहा, "हम तो फोन करके और व्यक्तिगत रूप से जाकर अपने लोगों से निवेदन कर रहे हैं कि उत्तराखंडी उम्मीदवार चाहे किसी भी दल से हो, उसे ही जिताएं।"

बछेती जी ने कहा, "वह भाजपा के साथ पिछले दो दशकों से भी अधिक समय से जुड़े हुए हैं। उत्तराखंड एकता मंच से जुड़ने का अर्थ यह नहीं था कि मैंने भाजपा छोड़ दी। यदि किरन बेदी के नामांकन पत्र दाखिल करने की प्रक्रिया में पार्टी मुझे बुलाती है और बिन्नी भी वहां मौजदू रहते हैं, तो मेरा वहां जाना गलत कैसे हो गया।"

जगदीश ममगाईं जी ने कहा, "यदि बछेती एक ऐसे कैंडिडेट (बिन्नी) के साथ मौजूद थे, जो कि एक उत्तराखंडी के खिलाफ चुनाव लड़ रहा है, तो यह एक गलत उदाहरण है। बछेती जी से मेरी बात हुई थी 4-5 दिन पहले और मैंने कहा था कि उतराखंड एकता मंच की एक बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय करते हैं। बैठक तो बुलाई नहीं गई और वह भाजपाई उम्मीदवारों के नामांकन में चले गए, यह उत्तराखंड एकता मंच के उद्द्ेश्यों के खिलाफ है। हम सबको एक ऐसी रणनीति बनानी चाहिए, जो उत्तराखंडियों के हितों के अनुसार हो और हम सबको उसी के हिसाब से चलना चाहिए।"

यहां स्पष्ट है कि मंच के सदस्यों में समन्वय का नितांत अभाव है। उन्होंने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के बाद ऐसी कोई रणनीति ही नहीं बनाई कि यदि राजनीतिक दल उत्तराखंडियों की उपेक्षा करें, तो मंच से जुड़े लोग क्या करेंगे? ऐसे में मंच के भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगना लाजिमी है। उत्तराखंड एकता मंच दिल्ली के बैनर तले उत्तराखंड के 150 से अधिक सामाजिक संस्थाओं को एक करना एक ऐतिहासिक कदम था। इस पहल को काल के गाल में समाने से रोकने के लिए प्रबुद्ध और प्रभावशाली उत्तराखंडियों को आगे आना चाहिए, अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब मंच इतिहास की बात रह जाएगा।

No comments:

Post a Comment