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Thursday, January 15, 2015

उत्तरायणी पर दिल्ली में सार्वजनिक अवकाश घोषित हो: नंदन सिंह रावत

Uttarakhand News, New Delhi - शायद कुछ आठ-दस साल बीते होंगे, मैं दैनिक जागरण में काम करता था और अपने एक वरिष्ठ साथी दीवान सिंह बोरा के साथ तत्कालीन उत्तराखंड कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत के
An age old photo depicting importance of Uttarayani Mela of Bageshwar.
आवास पर अक्सर जाया करता था। वहां रावत जी के कार्यालय में कुछ महत्वाकांक्षी और कर्मठ भावी नेता भी उपस्थित रहते थे। उनमें से एक उत्साही युवक राजनीति के हर विषय पर अपने विश्लेषण से कमरे में मौजूद सभी लोगों को चुप करा देता था। हरीश रावत जी के तो काफी नज़दीक तो वह था ही, उसकी बुलंद आवाज़ और हर छोटे-बड़े नेता को अतिनिकटता से जानने-पहचानने की योग्यता उसे भीड़ से अलग करती थी। इसी व्यक्ति का नाम है नंदन सिंह रावत।

नंदन सिंह रावत दिल्ली और उत्तराखंड की राजनीति में कोई नया नाम नहीं है। उत्तराखंड की तो हर पार्टी में उन्हें काफी स्नेह और आदर प्राप्त है। मुझे व्यक्तिगत रूप से काफी हैरानी होती है कि तमाम योग्तयताओं के बावजूद वह अब तक राज्यमंत्री या किसी परिषद के चेयरमैन क्यों नहीं बन सके।

Fruitless never-ending political journey on for Nandan Singh Rawat
नंदन सिंह रावत उत्तराखंड की अस्मिता और त्योहारों की पहचान को लेकर काफी भावुक हैं। उन्होंने मांग की है कि उत्तरायणी को दिल्ली में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाए। इसके पक्ष में उनका कहना है कि उत्तरायणी दिल्ली के 30-35 लाख लोगों का पवित्र त्योहार है। उत्तराखंड के लोगों की आस्था इस त्योहार से जुड़ी हुई है और भारत के प्राचीन ग्रंथों में भी इस त्योहार को अतिमहत्वपूर्ण माना गया है। हिंदू ग्रंथों के अनुसार सूर्य देवता साल के छह महीने दक्षिणायन और छह महीने उत्तरायण में स्थित रहते हैं। मकर संक्रांति के पवित्र दिन सूर्य देवता उत्तरायण में प्रवेश करते हैं।

उत्तराखंड के बागेश्वर जिले में सरयू गोमती व सुप्त भागीरथी के पावन संगम पर सदियों से भव्य उत्तरायणी मेले का आयोजन किया जाता है। उत्तराखंडियों की ऐसी मान्यता रही है कि मकर संक्रांति के दिन संगम मेें स्नान करने से सभी पाप कट जाते हैं और मनुष्य की आत्मा निर्मल हो जाती है।

इस अवसर पर उत्तराखंड के लोग हजारों की संख्या में दूर-दूर से संगम पर आकर मुंडन, जनेऊ संस्कार, पूजा-अर्चना व स्नान करते हैं और स्कूलों के विद्यार्थी रंगारंग कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं।

इसके अलावा बागेश्वर के उत्तरायणी मेले का आर्थिक पक्ष भी रहा है। यह उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल का प्राचीनतम मेला माना जाता है, जहां वस्तुओं की खरीद-फरोख्त के लिए उत्तराखंड के सभी 13 जिलों के अलावा रामपुर, बरेली, मुरादाबाद, नजीबाबाद, दिल्ली व उत्तरप्रदेश के अन्य जिलों से भी व्यापारी यहां आते रहे हैं।

जिस त्योहार से दिल्ली के करीब 35 लाख उत्तराखंडियों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं, उसे सार्वजनिक अवकाश घोषित करने में दिल्ली सरकार को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। नंदन सिंह रावत ने दावा किया है कि वह इस पवित्र दिवस के सम्मान को दिल्ली में स्थापित करने के लिए अपनी तरफ से कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे। उत्तराखंड की जनता और हमारी शुभकामनाएं उनके साथ हैं।

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