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Thursday, February 12, 2015

आप की जीत से उत्तराखंडियों को मिली - निराशा, हताशा और अनिश्चितता

Uttarakhand News - उत्तराखंड मूल के 36 लाख लोगों को आम आदमी पार्टी की 'भयावह' चुनावी जीत से कोई फायदा नहीं हुआ है। अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के करीब 18-19 लाख उत्तराखंडी मतदाताओं में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला, जो उनकी तथाकथित ईमानदार पार्टी के बैनर तले चुनावी संग्राम में हिस्सा ले पाता। स्पष्ट है उन्होंने उत्तराखंडियों की सिरे से उपेक्षा कर दी। क्या उत्तराखंड के लोग आम आदमी नहीं हैंं?

जब अन्ना का आंदोलन अपने उफान पर था, तो हजारों उत्तराखंडी लोग उनके साथ दृढ़ता से खड़े थे। बाद में अरविंद केजरीवाल ने राजनीतिक पार्टी का गठन किया, तो उत्तराखंडियों ने उनके फैसले का समर्थन किया और पार्टी के प्रचार-प्रसार मेें पूरा सहयोग किया। आम आदमी पार्टी की नीतियों का भरपूर प्रचार-प्रसार किया और उसकी ईमानदार होने की छवि को मजबूत किया। उत्तराखंडियों को उम्मीद थी कि कम से कम अरविंद केजरीवाल वे गलतियां तो नहीं दोहराएंगे, जो गलतियां सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस और भाजपा ने उत्तराखंडियों को जनसंख्या के अनुसार टिकट न देकर की थी। दुख की बात है कि यह उम्मीद एक मृग-मरीचिका ही निकली। अरविंद केजरीवाल ने उत्तराखंडी समुदाय के लोगों को उनकी जनसंख्या से हिसाब से प्रतिनिधित्व ने देकर कैसी ईमानदारी का परिचय दिया है। क्या केजरीवाल की नजर में उत्तराखंड के लोग आम आदमी नहीं हैं?

यदि अरविंद केजरीवाल उत्तराखंड के सुविधाविहीन गांवों का दौरा करें, तो उन्हें पता चलेगा कि असल में आम आदमी होना क्या होता है। वहां छोटे-छोटे बच्चे स्कूल पढ़ने के लिए घनघोर जंगलों से गुजरकर विद्यालय की कच्ची इमारतों में जाते हैं। वहां की महिलाएं पशुओं के लिए चारा लेने एेसे घनों वनों में जाती हैं, जो बाघ, भालुओं, कोबरा और हाथियों से भरे पड़े हैं। वहां के युवक दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में जाकर छोटे-मोटे काम करने के लिए मजबूर हैं, क्योकि वहां उनकी कोई जान-पहचान नहीं होती। ये पर्वतीय समाज के लोग बिना किसी के आगे हाथ फैलाए, बिना किसी की चमचागिरी किए और बिना किसी को चोर बताए, केवल अपने पुरुषार्थ के बल पर दिल्ली में अपना कुछ मुकाम बनाने में जुटे हुए हैं। यदि हमारे कुछ लोग चुनाव लड़कर क्षेत्र में अपना और अपने समाज का कुछ नाम करना चाहते हैं, तो इसमें गलत क्या है?

कुछ प्रश्न हैं जो आज के परिप्रेक्ष्य में मेरे दिमाग में आते हैं - 

* आखिर क्यों सभी राजनीतिक दल हमारे वोट तो चाहते हैं, पर हमें टिकट नहीं देना चाहते?

* आखिर कौन हैं वो लोग जो हमारे शहीदों का भी अपमान करने पर उतर आए हैं?

* आखिर कौन हैं हमारे वो उत्तराखंडी भाई जो भविष्य में टिकट मिलने की आस में आज अपने ही भाइयों का मजाक उड़ाने पर उतर आए हैं?

कुल मिलाकर यदि मैं यह कहूं कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा चुनावों में विजय ऐतिहासिक तो है, पर उसके बाद आप से जुड़े लोगों ने जो कुछ किया है, उससे उत्तराखंडियों को कुछ नहीं मिला, बल्कि उनमें निराशा, हताशा और अनिश्चितता की भावना का ही प्रसार हुआ है, तो यह गलत न होगा। 

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