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Saturday, March 28, 2015

क्या स्वयंभू ईमानदार पार्टी की बैठक बन गई गुंडों का जमावड़ा

Uttarakhand News - कहते हैं सत्ता निरंकुश होती है। सत्ता इन्सान का दिमाग खराब कर देती है। सत्ता के लिए दोस्त ही दोस्त का दुश्मन हो जाता है। सत्ताधारी नेता सारी ताकत अपने हाथ में रखना चाहता है और साम-दाम-दंड-भेद किसी भी तरह विरोधियों का संपूर्ण सफाया करने को तत्पर रहता है।

दिल्ली विधानसभा चुनावों में अभूतपूर्व जीत हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में आज जो कुछ होने का आरोप योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण लगा रहे हैं, उससे तो ऐसा प्रतीत होता है कि ईमानदार पार्टी होने का दावा करने वाला दल वास्तव में भाड़े के गुंडों का जमावड़ा गया है। बताया जाता है कि बैठक में लगभग 300 लोग थे और सिर्फ आठ लोगों ने योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार और अजीत झा को पाट्री की राष्ट्रीय कार्यसमिति से निकालने का विरोध किया। योगेंद्र यादव ने तो यह भी दावा किया कि 167 सदस्यों से पहले ही हस्ताक्षर करा लिए गए थे। बैठक पूरी तरह से स्क्रिप्टिड थी।

योगेंद्र यादव ने आगे कहा - बैठक में बाउंसर बुलाए गए थे और हमारे साथी को धसीटा गया।

प्रशांत भूषण ने कहा - न्यूट्रल अॉबसर्वर को बैठक में बुलाया नहीं गया, पार्टी के लोकपाल को बैठक में आने से मना कर दिया।

प्रो. आनंद कुमार ने कहा - मैं बैठक में बोलना चाहता था, पर अपनी बात रखने का मौका भी नहीं दिया गया। रहमान साहब को बैठक में चोट लगी, उन्हें ई-रिक्शा में बैठकर लाना पड़ा। मैं अब आम आदमी पार्टी का आम वालन्टियर हूं, उसी के तहत पार्टी में योगदान दूंगा।

पंजाब से आम आदमी पार्टी के सांसद धर्मवीर गांधी और दिल्ली के दो विधायकों (पुष्कर और देवेंद्र सहरावत) ने प्रस्ताव का विरोध किया। आम आदमी पार्टी के लिए शुरुआत से खून-पसीना एक करने वाले रमजान चौधरी ने टीवी चैनलों के कैमरों के आगे दयनीय और लुटी-पिटी हालत में कहा - मुझे जूतों से पीटा गया।

उधर, आम आदमी पाट्री के नेता आशुतोष ने कहा - योगेंद्र यादव झूठ बोल रहे हैं, बैठक में कोई मार-पीट नहीं हुई।

सच क्या है और झूठ क्या है, यह तो सिर्फ वही लोग जानते है जो कि बैठक में बंद दरवाज़े के अंदर बैठे थे, पर यह तो सच है कि कल जारी किए गए एक स्टिंग में यही सबकुछ करने की बात आआपा के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कही थी। अगर योगेंद्र यादव और साथियों पर भरोसा किया जाए, तो ऐसा प्रतीत होता है कि जिस दल ने सार्वजनिक जीवन में शुचिता और ईमानदारी की बात करके चुनाव में जीत हासिल की थी, उसका दामन पूरी तरह से साफ नहीं है।

आम आदमी पार्टी वही महान राजनीतिक दल है, जिसने दिल्ली के 36 लाख उत्तराखंडियों की घोर उपेक्षा करते हुए, दिल्ली विधानसभा चुनावों में एक भी उत्तराखंडी को उम्मीदवार नहीं बनाया था। केवल उत्तराखंडी ही नहीं, बल्कि आज तो दिल्ली का आम मतदाता पछता रहा होगा कि पांच साल के लिए अपना भविष्य उसने कैसे लोगों के हाथों में सौंप दिया है।

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