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Showing posts from April, 2015

उत्तराखंड के 'मां, माटी और मिशन' की 'अपणू दगै भेंट'

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Uttarakhand News -  उत्तराखंड का "मां, माटी और मिशन" एक अत्यंत महत्वाकांक्षी आंदोलन प्रतीत होता है, जिसके द्वारा भुवन जोशी "भास्कर" और पूरन घुघत्याल "प्रेम" राज्य का चेहरा बदल देना चाहते हैं। हममें से बहुत से लोगों ने "मां, माटी और मिशन" के बारे में पहले भी पढ़ा और सुना होगा। कुछ ने इसे उन हजारों संगठनों में से एक समझा होगा, जो हर रोज जन्म लेते हैं और कुछ समय बाद असमय ही दम तोड़ देते हैं, पर ज्यादातर लोगों का मानना है कि "मां, माटी और मिशन" कुछ हटकर है और इससे जुड़े लोगों में कुछ कर गुज़रने का जुनून है। यह जुनून भुवन जोशी और पूरन घुघत्याल को सही दिशा में आगे बढ़ने का उत्साह प्रदान करता है। इन लोगों से बात करते वक्त ही लगता है कि ये लोग अभूतपूर्व ऊर्जा से भरे हुए हैं और यही ऊर्जा है, जिसकी वजह से कुछ महीने पूर्व संगठन के कार्यकर्ताओं ने मुझे लगभग राज़ी कर लिया था कि मैं दिल्ली से रामनगर जाकर उनकी बैठक में शामिल होऊं। मेरा मानना है कि उत्तराखंड की भलाई के लिए "मां, माटी और मिशन"  के बैनर तले कुछ-न-कुछ सकारात्मक काम ज़रूर क

तांत्या टोपे को कृतज्ञ देशवासियों की श्रृद्धांजलि

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Uttarakhand News -  इस बार एक सुखद आश्चर्य यह देखने में आ रहा है कि अधिकांश राजनीतिक दलों के वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता भी भारत की आज़ादी की लड़ाई में प्राणों की आहुति देने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर रहे हैं। याद पहले भी किया करते थे, पर यह स्मृति गांधी जी,  पंडित नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह और सावरकर आदि तक सीमित रहती थी। इस बार तो आज़ादी की लड़ाई के हर सिपाही को श्रृद्धा-सुमन अर्पित करने की होड़-सी मची हुई है। शायद कांग्रेसी नेताओं को लगता है कि यदि भाजपा नेताओं ने पहले आंसू बहा दिए, तो राजनीतिक लाभ वे उठा ले जाएंगे जैसाकि उन्होंने सरदार पटेल औऱ मालवीय के मामले में किया, इसलिए कांग्रेसी नेता भी पीछे नहीं रहना चाहते। अच्छी बात यह है कि अब तांत्या टोपे जैसे आज़ादी की लड़ाई के महान सिपाही को सारे देश में याद किया जा रहा है। उत्तराखंड में भी भारत की पहली आजादी की लड़ाई के महानायक तांत्या टोपे की पुण्यतिथि पर उन्हें भावभीनी श्रृद्धांजलि दी जा रही है। तांत्या टोपे के बारे में सभी लोग जानते हैं, पर दो लाइनें मैं लिखना ज़रूर चाहूंगा। इस शहीद का पूरा नाम था - रामचंद्र पांडुर

उत्तराखंड की युवा पीढ़ी को चाहिए समाज में सम्मानजनक स्थान

Uttarakhand News - उत्तराखंड की युवा पीढ़ी अब भारतीय समाज में एक गौरवपूर्ण स्थान चाहती है। कुछ कर गुज़रने की ऊर्जा से भरे इन युवाओं में 25 साल से लेकर 50 साल तक के लोग भी शामिल हैं। आप कहेंगे कि 50 साल का व्यक्ति युवा कैसे? दरअसल, बात जब जातियों और पीढ़ियों की हो रही हो, तो हम इस आयु सीमा के लोगों को एक ग्रुप में रख सकते हैं। इस आयु समूह के अधिकांश लोग आरंभिक संघर्ष के बाद किसी-न-किसी रोजगार में लग चुके होते हैं और पेट भरने से आगे की बातें उनके दिमाग में आने लगती हैं। पहले क्या छवि थी उत्तराखंडी समाज के लोगों की भारत की आज़ादी के बाद दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में भारी संख्या में सरकारी और निजी क्षेत्र के कार्यालय खुले, तो पंजाबी, मराठी, बंगाली और दक्षिणी भारत के लोगों ने महत्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमा लिया, क्योंकि वे पढ़े-लिखे थे औऱ अपनी जाति के लोगों को आगे बढ़ाने की इच्छाशक्ति उनमें कूट-कूटकर भरी थी। उत्तराखंडी समाज गढ़वाली-कुमाऊंनी, राजपूत-ब्राह्मण, ऊंची जाति के ब्राह्मण और ऊंची जाति के राजपूत जैसे निरर्थक खांचों में बंटा हुआ था। इस बंटे हुए समाज को काम मिला चपरासी, कुक, घ