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Friday, April 3, 2015

उत्तराखंड की युवा पीढ़ी को चाहिए समाज में सम्मानजनक स्थान

Uttarakhand News - उत्तराखंड की युवा पीढ़ी अब भारतीय समाज में एक गौरवपूर्ण स्थान चाहती है। कुछ कर गुज़रने की ऊर्जा से भरे इन युवाओं में 25 साल से लेकर 50 साल तक के लोग भी शामिल हैं। आप कहेंगे कि 50 साल का व्यक्ति युवा कैसे? दरअसल, बात जब जातियों और पीढ़ियों की हो रही हो, तो हम इस आयु सीमा के लोगों को एक ग्रुप में रख सकते हैं। इस आयु समूह के अधिकांश लोग आरंभिक संघर्ष के बाद किसी-न-किसी रोजगार में लग चुके होते हैं और पेट भरने से आगे की बातें उनके दिमाग में आने लगती हैं।

पहले क्या छवि थी उत्तराखंडी समाज के लोगों की

भारत की आज़ादी के बाद दिल्ली, मुंबई और अन्य महानगरों में भारी संख्या में सरकारी और निजी क्षेत्र के कार्यालय खुले, तो पंजाबी, मराठी, बंगाली और दक्षिणी भारत के लोगों ने महत्वपूर्ण पदों पर अधिकार जमा लिया, क्योंकि वे पढ़े-लिखे थे औऱ अपनी जाति के लोगों को आगे बढ़ाने की इच्छाशक्ति उनमें कूट-कूटकर भरी थी। उत्तराखंडी समाज गढ़वाली-कुमाऊंनी, राजपूत-ब्राह्मण, ऊंची जाति के ब्राह्मण और ऊंची जाति के राजपूत जैसे निरर्थक खांचों में बंटा हुआ था। इस बंटे हुए समाज को काम मिला चपरासी, कुक, घरों में काम करने वाले नौकरों, मैकेनिकों के सहायकों और फील्ड जॉब करने वालों का। इससे उत्तराखंडी समाज की छवि ही ऐसी बन गई कि वे चपरासी या कुक होते हैं। दिल्ली के अनेक इलाकों में उत्तराखंडियों को गढ़वाली कहा जाता है। गढ़वालियों की सबसे बड़ी खूबी माना जाता है, उनका ईमानदार होना। आप समाचारपत्रों के क्लासिफाइड्स कॉलम में नौकरों, सहायकों और चपरासियों की नौकरी में अक्सर गढ़वालियों को प्राथमिकता देने की बात पढ़ सकते हैं, क्योंकि वे ईमानदार होते हैं। दुख की बात यह है कि उत्तराखंडियों को मैनेजर या वीपी या प्रेज़िडेंट पद के लिए प्राथमिकता नहीं दी जाती?

आज उत्तराखंडी लड़ रहे हैं पहचान के संकट की लड़ाई

पिछले दसेक सालों में हालात में कुछ बदलाव आए हैं। चपरासियों, सहायकों और अन्य कम वेतन वाले पदों पर काम करने के बावजूद उत्तराखंडियों ने अपने बच्चों को अच्छी तालीम दिलाई। पढ़े-लिखे उत्तराखंडी बच्चे नौकरी करने विदेश गए, भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में उन्होंने जगह बनाई, निजी क्षेत्र में भी मैनेजर, वीपी और डायरेक्टर जैसे पदों तक वे पहुंच गए। अब उत्तराखंडी समाज को अपने ऊपर लगे ईमानदार कुक या चपरासी के ठप्पे को हटाने की ज़रूरत पड़ रही है। जो लोग कमज़ोर मानसिकता के थे, उन्होंने खुद को उत्तराखंडी बताना ही बंद कर दिया। बाकी लोग भारत के हर महानगर में पहचान के संकट की लड़ाई लड़ रहे हैं। हर महीने एक नया संगठन बना रहे हैं उत्तराखंडी समुदाय के लोग। हाल ही में दिल्ली विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड एकता मंच का गठन किया गया, जिसमें 150 से ज्यादा उत्तराखंडी सामाजिक संगठनों की भागीदारी का दावा किया गया था।

दिल्ली में पहचान की पहली लड़ाई हम हार गए

उत्तराखंडियों के एकजुट होने और दिल्ली में करीब 15 लाख उत्तराखंडी मतदाता होने के दावों के बावजूद कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी ने हम लोगों की चुनावों में उम्मीदवार नहीं बनाया। सामंतशाही मानसिकता के लोगों को शायद यह लगता होगा कि चपरासी और कुक जैसे काम करने वाले उत्तराखंडियों को तो राजनीतिक कार्यक्रमों में दरी बिछानी चाहिए, ताली बजानी चाहिए, भीड़ का हिस्सा बनना चाहिए, न कि मंच पर खड़े होकर भाषण देने के सपने देखने चाहिए। स्पष्ट है कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में उत्तराखंडियों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में टिकट नहीं मिले। कांग्रेस और भाजपा ने एक-एक उत्तराखंडी को उम्मीदवार बनाया, जबकि आम आदमी पार्टी ने एक को भी टिकट नहीं दिया।

उत्तराखंडी अस्मिता की रक्षा की लड़ाई जारी है

आज जब मैं उत्तराखंडी युवाओं से बात करता हूं, तो महसूस करता हूं कि उत्तराखंडी अस्मिता की रक्षा की भावना उनके दिल में सुलग रही है। दिल्ली के उत्तराखंडियों ने 2017 में होने वाले दिल्ली नगर निगम के चुनावों के लिए अभी से कमर कसनी शुरु कर दी है। मैं यहां किसी का नाम लिखना नहीं चाहूंगा, पर सच यह है कि ऐसे उत्तराखंडी कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी, सभी राजनीतिक दलों में हैं, जो टिकट न मिलने की स्थिति में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भी चुनाव लड़ने को तैयार हैं। यही आत्मविश्वास है, जो उत्तराखंडियों को, आज नहीं तो कल, दिल्ली व अन्य महानगरों की सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था में उन्हें उनका यथोचित स्थान ज़रूर दिलाएगा।

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