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Friday, June 5, 2015

कब तक करेंगे प्रकृति से पाखंड

Uttarakhand News - (सच्चिदानंद शर्मा)
Sachidanand Sharma, Raj Nagar, Ghaziabad
विश्व पर्यावरण दिवस पर कुछ लिखने से पहले हिमालयन गौरव कवि गिर्दा की इस रचना का जिक्र  न करना न्यायसंगत नहीं होगा । 

एक तरफ बर्बाद बस्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ डूबती कश्तियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।
अजी वाह ! क्या बात तुम्हारी,
तुम तो पानी के व्योपारी,
खेल तुम्हारा, तुम्हीं खिलाड़ी,
बिछी हुई ये बिसात तुम्हारी,
सारा पानी चूस रहे हो,
नदी-समन्दर लूट रहे हो,
गंगा-यमुना की छाती पर
कंकड़-पत्थर कूट रहे हो,
उफ!! तुम्हारी ये खुदगर्जी,
चलेगी कब तक ये मनमर्जी,
जिस दिन डोलगी ये धरती,
सर से निकलेगी सब मस्ती,
महल-चौबारे बह जायेंगे
खाली रौखड़ रह जायेंगे
बूँद-बूँद को तरसोगे जब -
बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
नगद – उधारी – तब क्या होगा ??
आज भले ही मौज उड़ा लो,
नदियों को प्यासा तड़पा लो,
गंगा को कीचड़ कर डालो,
लेकिन डोलेगी जब धरती – बोल व्योपारी – तब क्या होगा ?
वर्ल्ड बैंक के टोकनधारी – तब क्या होगा ?
योजनकारी – तब क्या होगा ?
नगद-उधारी तब क्या होगा ?
एक तरफ हैं सूखी नदियाँ – एक तरफ हो तुम।
एक तरफ है प्यासी दुनियाँ – एक तरफ हो तुम।

हमें कोई कितना भी आगाह क्यों न करता रहे हम भारतवासी न कभी चेते हैं , न  हैं हम  चेतने  वाले क्योंकि हम हैं ही कुछ निराले !! भयंकर से भयंकर बाढ़ ,भूस्खलन , भूकम्प , बादल फटना ,ओला वृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाओं को झेलने की हमारी नियति अब हमारी मानसिकता बन चुकी है । करोड़ों की आबादी वाले इस देश में प्रतिवर्ष लाखों लोगों के मरने के बाद जो सरकारी कारोबार चलता है इस कटु सत्य से अब हम सब वाकिफ  है । यह सब देखकर लगता है कि  सरकारें भी अब गिद्ध की  तरह प्राकृतिक आपदा के आने  का इंतज़ार कर रही होती हैं । अधिकांश गैर सरकारी संस्थान पर्यावरण रक्षा के  नाम पर सरकारी तंत्र से घाल - मेल करके राजस्व को दोहने का कार्य कर रहे हैं । आज हिमालय व् हिमालयी  राज्यों का अस्तित्व खतरे में है । प्राकृतिक ,सामाजिक ,राजनैतिक व् सामरिक दृष्टिकोण से यह राज्य अत्यंत संवेदनशील बने हुए हैं । पर्यावरण के नाम पर हम अक्सर अपने हिस्से के हिमालय और गंगा की चिंता करते हुए नज़र आते हैं जबकि सच यह है कि यदि हिमालय को बचाना है तो हमें पूरे हिमालय व् उसके गर्भ में बसे अपने पर्वतीय प्रदेशों जैसे जम्मू- कश्मीर, हिमांचल ,उत्तराखंड ,मिजोरम , मणिपुर ,मेघालय ,अरुणाचल ,असम , नागालैंड व् त्रिपुरा के स्वरुप का भी चिंतन करना पड़ेगा । हमें गंगा के अस्तित्व को बचाने के साथ - साथ चिनाब ,सतलुज ,रावी ,यमुना ,व्यास , काली गंगा ,शारदा ,लाछू ,लोहान , दीदक ,ढुधनाई , चीनारी , तुरैल , तुवाल , दिवांग , गोमती ,त्रिपुरा ,कामिंग , भरौली , सुवानसीरी , बारक , धनसिरी , दिहिंग ,लोहित आदि जीवन दायिनी नदियों का संरक्षण व् संवर्धन करना अत्यंत आवश्यक  है जिनका उद्गम स्थान हिमालय है । प्रतिवर्ष हिमालय इन नदियों के अतिरिक्त लगभग १० करोड़ क्यूबिक मीटर जल एशिया महाद्धीप  के अन्य देशों को भी देता है ,इसलिए हिमालय को एशिया महाद्धीप  का वाटर टैंक भी कहा जाता है । यदि  सरकार की उपेक्षित नीतियाँ  व् पर्यावरण का मानवीय दोहन इसी प्रकार जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब चिरस्थायी ये नदियां अपना मौलिक स्वरुप खोकर नाममात्र ही रह जायेंगी । 

जब - जब सरकार विकास के नाम पर पहाड़ों पर रेल दौड़ने की बात कहती है तो मेरी रूह कांपने  लगती है । भौगोलिक दृष्टिकोण से हिमालय के ये कच्चे पहाड़ वलित पर्वत श्रेणी की श्रंखला में आते हैं जो अभी भी निर्माणाधीन हैं । भूगर्भीय हलचलों के कारण प्रत्येक वर्ष हिमालय की ऊंचाई बढ़ती जा रही है । आज से लगभग सात करोड़ वर्ष पूर्व यहाँ  टेथिस नामक सागर लहराया करता था जो कि यूरोप व् एशिया महाद्धीप से आने वाली नदियों के अवसाद से भरता गया और  आज वह हिमालय के स्वरुप में हमारे सामने विद्यमान है । सरकार द्धारा यदि  इन कच्चे पहाड़ों को काटकर अथवा टन्नल बनाकर ट्रैन  की पटरी बिछा कर उस पर ट्रैन दौड़ाई  जाती हैं तो इसके परिणामस्वरूप होने वाले विनाश की कल्पना ही की जा सकती है । यह सुखद अहसास है कि आज सरकार की जन व् पर्यावरण विरोधी नीतियों के खिलाफ जनमानस चेत रहा है । वृक्षों को अपनी संतान की तरह पालने वाले यहाँ  के ग्राम वासी अपने जल -जंगल व् जमीन को बचाने के लिए मुखर हो रहे हैं । वीर भड़ श्री माधो सिंह भंडारी  जी की जन्मस्थली मलेथा को बचाने के लिए  वहाँ पर लगे अवैध खनन  क्रेशरों  का विरोध इसका ज्वलंत प्रमाण है।

मै सदैव जल जंगल व् जमीन से स्थानीय क्षेत्रवासियों को प्राप्त होने वाले हक़ हक़ूब व  ' प्राकृतिक सुखाधिकार ' का प्रबल पक्षधर रहा हूँ । सरकार की जन विरोधी नीतियां - कि वह स्थानीय क्षेत्रवासियों को जंगल से एक गठ्ठर सूखी लकड़ी,पशु चारे के लिए पत्तियाँ  व नदियों के तटों से एक मुट्ठी रेत - पत्थर ,यहां तक कि बाढ़ में  बह कर आयी वन वृक्षों की टहनियों तक को ले जाने के लिए प्रतिबन्ध लगाती है, जिसका मैं घोर विरोधी हूँ । बाढ़  में बह कर आई करोड़ों रुपये की वन सम्पदा योंही सड़ - गलकर नष्ट हो जाती है , न तो सरकार ही समय पर  उसका सदुपयोग करती है और नाही स्थानीय लोगों को करने देती है । पर्यावरण की सुरक्षा तभी संभव है जब वहाँ निवास करने वाला जनजीवन भी सुरक्षित रहेगा और उनके सुखाधिकार भी सुरक्षित होंगे । आज विश्व पर्यावरण दिवस  पर मेरा हर एक  हिमालय वासी से विनम्र निवेदन है कि वे प्रति माह के हिसाब से वर्ष में बारह वृक्ष अवश्य लगाएं इससे हमारी हरी भरी धरती का सपना साकार होगा । प्रकृति प्रेमी वर्ड्सवर्थ  की ये पंक्ति हमें सदैव याद रखनी चाहिए कि "प्रकृति कभी उसको  धोखा नहीं देती जो उससे प्रेम करता है ।" 

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